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Rigveda Mandal 2 / Sukta 16 / Mantra 8

43 Sukta
9 Mantra
2/16/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
पु॒रा सं॑बा॒धाद॒भ्या व॑वृत्स्व नो धे॒नुर्न व॒त्सं यव॑सस्य पि॒प्युषी॑। स॒कृत्सु ते॑ सुम॒तिभिः॑ शतक्रतो॒ सं पत्नी॑भि॒र्न वृष॑णो नसीमहि॥

पु॒रा । स॒म्ऽबा॒धात् । अ॒भि । आ । व॒वृ॒त्स्व॒ । नः॒ । धे॒नुः । न । व॒त्सम् । यव॑सस्य । पि॒प्युषी॑ । स॒कृत् । सु । ते॒ । सु॒म॒तिऽभिः॑ । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो । सम् । पत्नी॑भिः । न । वृष॑णः । न॒सी॒म॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
पुरा संबाधादभ्या ववृत्स्व नो धेनुर्न वत्सं यवसस्य पिप्युषी। सकृत्सु ते सुमतिभिः शतक्रतो सं पत्नीभिर्न वृषणो नसीमहि॥

पुरा। सम्ऽबाधात्। अभि। आ। ववृत्स्व। नः। धेनुः। न। वत्सम्। यवसस्य। पिप्युषी। सकृत्। सु। ते। सुमतिऽभिः। शतक्रतो इति शतऽक्रतो। सम्। पत्नीभिः। न। वृषणः। नसीमहि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 18 Mantra » 3

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Meaning
हे (शतक्रतो) असंख्य बुद्धियोंवाले जन आप (यवसस्य) यवादि अन्नसम्बन्धी (वत्सम्) बछड़े को (पिप्युषी) वृद्ध (धेनुः) गौ (न) जैसे वैसे वा (सुमतिभिः) जिनकी सुन्दर बुद्धियाँ उन (पत्नीभिः) पत्नियों के साथ (वृषणः) बलवान् सेचनकर्त्ता जन जैसे (न) वैसे (ते) आपके (सम्बाधात्) सम्बन्ध से (पुरा) प्रथम (नः) हम लोगों को (अभि, आ, ववृत्स्व) सब ओर से अच्छे प्रकार वर्तो, जिससे हम लोग (सकृत्) एक बार (सुसन्नसीमहि) सुन्दरता से जावें ॥८॥
Essence
जो और प्राणियों को पीड़ा से निवृत्त करते हैं, वे आप भी पीड़ा से निवृत्त होते हैं। जैसे क्रियमाण पत्नी के साथ पति आनन्दित होता है, वैसे सज्जन के साथ सब आनन्दित होते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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