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Rigveda Mandal 2 / Sukta 16 / Mantra 6

43 Sukta
9 Mantra
2/16/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वृषा॑ ते॒ वज्र॑ उ॒त ते॒ वृषा॒ रथो॒ वृष॑णा॒ हरी॑ वृष॒भाण्यायु॑धा। वृष्णो॒ मद॑स्य वृषभ॒ त्वमी॑शिष॒ इन्द्र॒ सोम॑स्य वृष॒भस्य॑ तृप्णुहि॥

वृषा॑ । ते॒ । वज्रः॑ । उ॒त । ते॒ । वृषा॑ । रथः॑ । वृष॑णा । हरी॒ इति॑ । वृ॒ष॒भाणि॑ । आयु॑धा । वृष्णः॑ । मद॑स्य । वृ॒ष॒भ॒ । त्वम् । ई॒शि॒षे॒ । इन्द्र॑ । सोम॑स्य । वृ॒ष॒भस्य॑ । तृ॒प्णु॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
वृषा ते वज्र उत ते वृषा रथो वृषणा हरी वृषभाण्यायुधा। वृष्णो मदस्य वृषभ त्वमीशिष इन्द्र सोमस्य वृषभस्य तृप्णुहि॥

वृषा। ते। वज्रः। उत। ते। वृषा। रथः। वृषणा। हरी इति। वृषभाणि। आयुधा। वृष्णः। मदस्य। वृषभ। त्वम्। ईशिषे। इन्द्र। सोमस्य। वृषभस्य। तृप्णुहि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 18 Mantra » 1

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Meaning
हे (वृषभ) अत्युत्तम (इन्द्र) परमैश्वर्य्ययुक्त विद्वान् जिन (ते) आपका (वृषा) दूसरे की शक्ति का प्रतिबन्धन करनेवाला (वज्रः) वेग (उत) और (ते) आपका (वृषा) वेगवान् (रथः) रथ (वृषणा) बलिष्ठ (हरी) हरणशील घोड़े (वृषभाणि) और शत्रुओं के बल को रोकनेवाले (आयुधा) शस्त्र-अस्त्र हैं सो जिस (वृष्णः) बल करनेवाले (मदस्य) हर्ष का और (वृषभस्य) पुष्टि करनेवाले (सोमस्य) ओषध्यादि रस के आप (ईशिषे) स्वामी होते हैं उससे (तृप्णुहि) तृप्त होओ ॥६॥
Essence
जिनके सब कामों की सिद्धि करानेवाले साधनोपसाधन दृढ़ वा प्रशंसित काम हैं, वे कामों के साधन कराने को पीड़ित नहीं होते ॥६॥
Subject
फिर विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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