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Rigveda Mandal 2 / Sukta 16 / Mantra 5

43 Sukta
9 Mantra
2/16/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वृष्णः॒ कोशः॑ पवते॒ मध्व॑ ऊ॒र्मिर्वृ॑ष॒भान्ना॑य वृष॒भाय॒ पात॑वे। वृष॑णाध्व॒र्यू वृ॑ष॒भासो॒ अद्र॑यो॒ वृष॑णं॒ सोमं॑ वृष॒भाय॑ सुष्वति॥

वृष्णः॒ । कोशः॑ । प॒व॒ते॒ । मध्वः॑ । ऊ॒र्मिः । वृ॒ष॒भऽअ॑न्नाय । वृ॒ष॒भाय॑ । पात॑वे । वृष॑णा । अ॒ध्व॒र्यू इति॑ । वृ॒ष॒भासः॑ । अद्र॑यः । वृष॑णम् । सोम॑म् । वृ॒ष॒भाय॑ । सु॒स्व॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
वृष्णः कोशः पवते मध्व ऊर्मिर्वृषभान्नाय वृषभाय पातवे। वृषणाध्वर्यू वृषभासो अद्रयो वृषणं सोमं वृषभाय सुष्वति॥

वृष्णः। कोशः। पवते। मध्वः। ऊर्मिः। वृषभऽअन्नाय। वृषभाय। पातवे। वृषणा। अध्वर्यू इति। वृषभासः। अद्रयः। वृषणम्। सोमम्। वृषभाय। सुस्वति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 17 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (मध्वः) शहद वा मधुर रसकी (ऊर्मिः) तरंग वा (वृष्णः) जल वर्षानेवाले सूर्य से (कोशः) मेघ (वृषभान्नाय) श्रेष्ठ जिससे अन्न हो उस (वृषभाय) श्रेष्ठ के लिये (पवते) प्राप्त होता वा जैसे (पातवे) पीने के लिये (वृषभासः) वर्षनेवाले (अद्रयः) मेघ (वृषभाय) दुष्टों की शक्ति को बाँधनेवाले के लिये (वृषणम्) बलकारक (सोमम्) सोमलतादि ओषधि रस को और (वृषणा) श्रेष्ठ (अध्वर्यू) अपने को अहिंसा की इच्छा करनेवाले का (सुष्वति) सार निकालते हैं, वैसे तुम भी निकालनेवाले हूजिये ॥५॥
Essence
जैसे मेघ सूर्य से उत्पन्न होकर पुष्कल अन्न का निमित्त होता और सब प्राणियों को तृप्त करता है, वैसे विद्वानों को भी होना चाहिये ॥०५॥
Subject
अब सूर्य विषय को अगले मन्त्र में कहा गया है।

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