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Rigveda Mandal 2 / Sukta 16 / Mantra 4

43 Sukta
9 Mantra
2/16/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
विश्वे॒ ह्य॑स्मै यज॒ताय॑ धृ॒ष्णवे॒ क्रतुं॒ भर॑न्ति वृष॒भाय॒ सश्च॑ते। वृषा॑ यजस्व ह॒विषा॑ वि॒दुष्ट॑रः॒ पिबे॑न्द्र॒ सोमं॑ वृष॒भेण॑ भा॒नुना॑॥

विश्वे॑ । हि । अ॒स्मै॒ । य॒ज॒ताय॑ । धृ॒ष्णवे॑ । क्रतु॑म् । भर॑न्ति । वृ॒ष॒भाय॑ । सश्च॑ते । वृषा॑ । य॒ज॒स्व॒ । ह॒विषा॑ । वि॒दुःऽत॑रः । पिब॑ । इ॒न्द्र॒ । सोम॑म् । वृ॒ष॒भेण॑ । भा॒नुना॑ ॥

Mantra without Swara
विश्वे ह्यस्मै यजताय धृष्णवे क्रतुं भरन्ति वृषभाय सश्चते। वृषा यजस्व हविषा विदुष्टरः पिबेन्द्र सोमं वृषभेण भानुना॥

विश्वे। हि। अस्मै। यजताय। धृष्णवे। क्रतुम्। भरन्ति। वृषभाय। सश्चते। वृषा। यजस्व। हविषा। विदुःऽतरः। पिब। इन्द्र। सोमम्। वृषभेण। भानुना॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 17 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य के इच्छुक (वृषा) शत्रु की शक्ति बाँधनेहारे (विदुष्टरः) अतीव विद्वान् ! आप जो (हि) ही (विश्वे) सर्वत्र (वृषभेण) वर्षा करानेवाले (भानुना) ताप से युक्त सूर्य जैसे रसको वैसे (अस्मै) इस (यजताय) संगम (धृष्णवे) दृढ़ता (वृषभाय) श्रेष्ठता (सश्चते) और सम्बन्ध के लिये (क्रतुम्) प्रज्ञा को (भरन्ति) धारण करते हैं उनके अनुसंगी होते हुए (हविषा) देने लेने योग्य वस्तु से (यजस्व) यज्ञ करो और (सोमम्) ओषध्यादि पदार्थों के रस को (पिब) पिओ ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्रथम से अपनी बुद्धि को उन्नति देकर विद्वानों का सत्कार करते हैं, वे सब जगत् में सत्कारयुक्त होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।