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Rigveda Mandal 2 / Sukta 16 / Mantra 3

43 Sukta
9 Mantra
2/16/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
न क्षो॒णीभ्यां॑ परि॒भ्वे॑ त इन्द्रि॒यं न स॑मु॒द्रैः पर्व॑तैरिन्द्र ते॒ रथः॑। न ते॒ वज्र॒मन्व॑श्नोति॒ कश्च॒न यदा॒शुभिः॒ पत॑सि॒ योज॑ना पु॒रु॥

न । क्षो॒णीभ्या॑म् । प॒रि॒ऽभ्वे॑ । ते॒ । इ॒न्द्रि॒यम् । न । स॒मु॒द्रैः । पर्व॑तैः । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । रथः॑ । न । ते॒ । वज्र॑म् । अनु॑ । अ॒श्नो॒ति॒ । कः । च॒न । यत् । आ॒शुऽभिः॑ । पत॑सि । योज॑ना । पु॒रु ॥

Mantra without Swara
न क्षोणीभ्यां परिभ्वे त इन्द्रियं न समुद्रैः पर्वतैरिन्द्र ते रथः। न ते वज्रमन्वश्नोति कश्चन यदाशुभिः पतसि योजना पुरु॥

न। क्षोणीभ्याम्। परिऽभ्वे। ते। इन्द्रियम्। न। समुद्रैः। पर्वतैः। इन्द्र। ते। रथः। न। ते। वज्रम्। अनु। अश्नोति। कः। चन। यत्। आशुऽभिः। पतसि। योजना। पुरु॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) बिजली के समान वर्त्तमान जिन (ते) आपको (इन्द्रियम्) धन (क्षोणीभ्याम्) आकाश और पृथिवी से (न) नहीं (परिभ्वे) तिरस्कार प्राप्त होता जिन (ते) आपका (समुद्रैः) सागरों और (पर्वतैः) पर्वतों से (रथः) रथ (न) नहीं तिरस्कार को प्राप्त होता जिन (ते) आपका (वज्रम्) छिन्न-भिन्न करनेवाले शस्त्र को (कश्चन) कोई (न, अनु, अश्नोति) नहीं अनुकूलता से व्याप्त होता (यत्) जो (आशुभिः) शीघ्रगमन करानेवाली बिजली के साथ युक्त रथ से (पुरु) बहुत (योजना) योजनों को (पतसि) जाते हैं सो आप सर्वथा विजयी होने योग्य हैं ॥३॥
Essence
जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों से युक्त शस्त्र-अस्त्र आदि पदार्थों को सिद्ध करते हैं, वे तिरस्कार को नहीं पहुँचते और जो लोग आकाश, समुद्र, तथा पहाड़ी भूमि में भी रथों को चलाते हैं, वे सुख से मार्ग के पार होते हैं ॥३॥
Subject
अब विद्वान् के विषय को इस मन्त्र में कहा गया है।