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Rigveda Mandal 2 / Sukta 16 / Mantra 1

43 Sukta
9 Mantra
2/16/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र वः॑ स॒तां ज्येष्ठ॑तमाय सुष्टु॒तिम॒ग्नावि॑व समिधा॒ने ह॒विर्भ॑रे। इन्द्र॑मजु॒र्यं ज॒रय॑न्तमुक्षि॒तं स॒नाद्युवा॑न॒मव॑से हवामहे॥

प्र । वः॒ । स॒ताम् । ज्येष्ठ॑तमाय । सु॒ऽस्तु॒तिम् । अ॒ग्नौऽइ॑व । स॒म्ऽइ॒धा॒ने । ह॒विः । भ॒रे॒ । इन्द्र॑म् । अ॒जु॒र्यम् । ज॒रय॑न्तम् । उ॒क्षि॒तम् । स॒नात् । युवा॑नम् । अव॑से । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
प्र वः सतां ज्येष्ठतमाय सुष्टुतिमग्नाविव समिधाने हविर्भरे। इन्द्रमजुर्यं जरयन्तमुक्षितं सनाद्युवानमवसे हवामहे॥

प्र। वः। सताम्। ज्येष्ठतमाय। सुऽस्तुतिम्। अग्नौऽइव। सम्ऽइधाने। हविः। भरे। इन्द्रम्। अजुर्यम्। जरयन्तम्। उक्षितम्। सनात्। युवानम्। अवसे। हवामहे॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 17 Mantra » 1

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Meaning
हे विद्वानो ! हम लोग (सताम्) आप सज्जनों के (ज्येष्ठतमाय) अत्यन्त बढ़े हुए (अवसे) रक्षा आदि के लिये (हविः) हविष्य पदार्थ को (भरे) भरें धारण करें वा पुष्ट करें उस (समिधाने) अच्छे प्रकार प्रदीप्त (अग्नाविव) अग्नि में जैसे वैसे (सुष्टुतिम्) सुन्दर स्तुति को (हवामहे) स्वीकार करें और (सनात्) निरन्तर (युवानम्) दूसरे का भेद और (उक्षितम्) सेचन करनेवाले तथा (अजुर्यम्) पुष्ट (जरयन्तम्) औरों को जरावस्था प्राप्त करानेवाले (इन्द्रम्) विद्युत् रूप अग्नि को उत्तमता स्वीकार करें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अग्नि और विभाग आदि कर्मों का करनेवाला बिजली रूप अग्नि युक्ति के साथ संयुक्त किया हुआ बहुत ऐश्वर्य को उत्पन्न करता है, वैसे सत्पुरुषों की प्रशंसा सबकी श्रेष्ठता के लिये कल्पना की जाती है ॥१॥
Subject
अब नव चावाले सोलहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में बिजली के विषय को कहते हैं।

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