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Rigveda Mandal 2 / Sukta 15 / Mantra 7

43 Sukta
10 Mantra
2/15/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स वि॒द्वाँ अ॑पगो॒हं क॒नीना॑मा॒विर्भव॒न्नुद॑तिष्ठत्परा॒वृक्। प्रति॑ श्रो॒णः स्था॒द्व्य१॒॑नग॑चष्ट॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

सः । वि॒द्वान् । अ॒प॒ऽगो॒हम् । क॒नीना॑म् । आ॒विः । भव॑न् । उत् । अ॒ति॒ष्ठ॒त् । प॒रा॒ऽवृक् । प्रति॑ । श्रो॒णः । स्था॒त् । वि । अ॒नक् । अ॒च॒ष्ट॒ । सोम॑स्य । ता । मदे॑ । इन्द्रः॑ । च॒का॒र॒ ॥

Mantra without Swara
स विद्वाँ अपगोहं कनीनामाविर्भवन्नुदतिष्ठत्परावृक्। प्रति श्रोणः स्थाद्व्य१नगचष्ट सोमस्य ता मद इन्द्रश्चकार॥

सः। विद्वान्। अपऽगोहम्। कनीनाम्। आविः। भवन्। उत्। अतिष्ठत्। पराऽवृक्। प्रति। श्रोणः। स्थात्। वि। अनक्। अचष्ट। सोमस्य। ता। मदे। इन्द्रः। चकार॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (श्रोणः) सुननेवाला विद्वान् जन (इन्द्रः) सर्व पदार्थ अलग-अलग करनेवाला सूर्य जैसे (सोमस्य) संसार के बीच (कनीनाम्) कान्तियों के (अपगोहम्) अपगूहन आच्छादन करने को (परावृक्) खोलता (आविर्भवन्) प्रकट होता हुआ (उदतिष्ठत्) ऊपर को स्थिर होता अर्थात् उदय होकर ऊपर को बढ़ता (प्रतिष्ठात्) और प्रतिष्ठा पाता (व्यनक्) पदार्थों को प्रकट करता (अचष्ट) उपदेश करता अर्थात् अपनी गति से यथावत् समय को बतलाता वैसे (मदे) हर्ष के निमित्त (ता) उन कामों को (चकार) करता है (सः) वह सबको सत्कार करने योग्य है ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य अपने प्रकाशदान से अन्धकार को निवृत्त कर विचित्र संसार दिखलाता है, वैसे जो विद्वान् जन सत्य विद्या का उपदेश देने से अविद्या को निवृत्त कर विविध पदार्थ विज्ञान को प्रकट करते हैं, वे विश्व के भूषित करनेवाले होते हैं ॥७॥
Subject
अब सूर्य के दृष्टान्त से विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।