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Rigveda Mandal 2 / Sukta 15 / Mantra 5

43 Sukta
10 Mantra
2/15/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स ईं॑ म॒हीं धुनि॒मेतो॑ररम्णा॒त्सो अ॑स्ना॒तॄन॑पारयत्स्व॒स्ति। त उ॒त्स्नाय॑ र॒यिम॒भि प्र त॑स्थुः॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

सः । ई॒म् । म॒हीम् । धुनि॑म् । एतोः॑ । अ॒र॒म्णा॒त् । सः । अ॒स्ना॒तॄन् । अ॒पा॒र॒य॒त् । स्व॒स्ति । ते । उ॒त्ऽस्नाय॑ । र॒यिम् । अ॒भि । प्र । त॒स्थुः॒ । सोम॑स्य । ता । मदे॑ । इन्द्रः॑ । च॒का॒र॒ ॥

Mantra without Swara
स ईं महीं धुनिमेतोररम्णात्सो अस्नातॄनपारयत्स्वस्ति। त उत्स्नाय रयिमभि प्र तस्थुः सोमस्य ता मद इन्द्रश्चकार॥

सः। ईम्। महीम्। धुनिम्। एतोः। अरम्णात्। सः। अस्नातॄन्। अपारयत्। स्वस्ति। ते। उत्ऽस्नाय। रयिम्। अभि। प्र। तस्थुः। सोमस्य। ता। मदे। इन्द्रः। चकार॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमेश्वर (सोमस्य) उत्पन्न जगत् के बीच (ईम्) जल और (धुनिम्) चलती हुई (महीम्) पृथिवी को (अरम्णात्) हन्ता है (सः) वह (अस्नातॄन्) अस्नातक अर्थात् जो यज्ञ स्नान नहीं किये उनके (एतोः) गमन को (स्वस्ति) कल्याण जैसे हो वैसे (अभि, अपारयत्) सब ओर से पार पहुँचाता है जो (ता) उक्त कामों को (मदे) हर्ष के निमित्त (चकार) करता है और जो विद्वान् जन उक्त ईश्वर के निमित्त (उत्स्नाय) उत्तम समाधिस्नान कर (रयिम्) धनको (प्रतस्थुः) प्रस्थित करते फिरते (ते) वे दुःख को छोड़ते वह सबको सेवने योग्य है ॥५॥
Essence
जो जगदीश्वर जगत् का रचने वा पालना करने वा हननेवाला और मुक्ति में शुद्धाचरण करनेवालों को दुःख से पार करनेवाला है, जो इस शुद्ध ईश्वर में समाधि से न्हाय (स्नानकर) के पवित्र होते हैं, वे सब जगत् में सब जगह प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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