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Rigveda Mandal 2 / Sukta 15 / Mantra 4

43 Sukta
10 Mantra
2/15/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स प्र॑वो॒ळ्हॄन्प॑रि॒गत्या॑ द॒भीते॒र्विश्व॑मधा॒गायु॑धमि॒द्धे अ॒ग्नौ। सं गोभि॒रश्वै॑रसृज॒द्रथे॑भिः॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

सः । प्र॒ऽवो॒ळ्हॄन् । प॒रि॒ऽगत्य॑ । द॒भीतेः॑ । विश्व॑म् । अ॒धा॒क् । आयु॑धम् । इ॒द्धे । अ॒ग्नौ । सम् । गोभिः॑ । अश्वैः॑ । अ॒सृ॒ज॒त् । रथे॑भिः । सोम॑स्य । ता । मदे॑ । इन्द्रः॑ । च॒का॒र॒ ॥

Mantra without Swara
स प्रवोळ्हॄन्परिगत्या दभीतेर्विश्वमधागायुधमिद्धे अग्नौ। सं गोभिरश्वैरसृजद्रथेभिः सोमस्य ता मद इन्द्रश्चकार॥

सः। प्रऽवोळ्हॄन्। परिऽगत्य। दभीतेः। विश्वम्। अधाक्। आयुधम्। इद्धे। अग्नौ। सम्। गोभिः। अश्वैः। असृजत्। रथेभिः। सोमस्य। ता। मदे। इन्द्रः। चकार॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) जगदीश्वर (दभीतेः) हिंसा से (परिगत्य) सब ओर से प्राप्त होकर (विश्वम्) समस्त जगत् को (प्रवोढॄन्) उसको प्रकृष्टता से पहुँचानेवालों को (आयुधम्) शस्त्र के समान (समिद्धे) प्रदीप्त (अग्नौ) अग्नि में (अधाक्) भस्म करता है वा (गोभिः) गौओं (अश्वैः) तुरङ्गों और (रथेभिः) भूमि में चलवानेवाले रथादि यानों से (सोमस्य) उत्पन्न हुए जगत् के (मदे) हर्ष के निमित्त (ता) ऐश्वर्य्यसम्बन्धी उक्त कामों को (चकार) करता है (सः) वह प्रलय का करनेवाला ईश्वर सबको सब ओर से ध्यान करने योग्य है ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे संप्राप्त अग्नि सूखे और गीले पदार्थ को भस्म करता है, वैसे अच्छे प्रकार प्राप्त हुए प्रलय समय में जगदीश्वर सबका प्रलय करता है ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।