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Rigveda Mandal 2 / Sukta 15 / Mantra 3

43 Sukta
10 Mantra
2/15/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सद्मे॑व॒ प्राचो॒ वि मि॑माय॒ मानै॒र्वज्रे॑ण॒ खान्य॑तृणन्न॒दीना॑म्। वृथा॑सृजत्प॒थिभि॑र्दीर्घया॒थैः सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

सद्म॑ऽइव । प्राचः॑ । वि । मि॒मा॒य॒ । मानैः॑ । वज्रे॑ण । खानि॑ । अ॒तृ॒ण॒त् । न॒दीना॑म् । वृथा॑ । अ॒सृ॒ज॒त् । प॒थिऽभिः॑ । दी॒र्घ॒ऽया॒थैः । सोम॑स्य । ता । मदे॑ । इन्द्रः॑ । च॒का॒र॒ ॥

Mantra without Swara
सद्मेव प्राचो वि मिमाय मानैर्वज्रेण खान्यतृणन्नदीनाम्। वृथासृजत्पथिभिर्दीर्घयाथैः सोमस्य ता मद इन्द्रश्चकार॥

सद्मऽइव। प्राचः। वि। मिमाय। मानैः। वज्रेण। खानि। अतृणत्। नदीनाम्। वृथा। असृजत्। पथिऽभिः। दीर्घऽयाथैः। सोमस्य। ता। मदे। इन्द्रः। चकार॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो जो (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमेश्वर (मानैः) परिमाणों से (सद्मेव) घर के समान (प्राचः) प्राचीन लोकों को (विमियाय) निर्माण करता बनाता है, (नदीनाम्) अव्यक्तशब्दयुक्त नदियों के (खानि) खातों को अर्थात् जलस्थानों को (वज्रेण) विज्ञान से (अतृणत्) विस्तारता (दीर्घयाथैः) जिनमें दीर्घ बड़े-बड़े गमन चालें उन (पथिभिः) मार्गों के साथ सब लोकों को (वृथा) वृथा (असृजत्) रचता (सोमस्य) उत्पन्न हुए जगत् के (मदे) हर्ष के निमित्त (ता) उन उक्त कर्मों को (चकार) करता है, वह जगत् का निर्माण करनेवाला दयालु ईश्वर जानना चाहिये ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जिस ईश्वर से पूर्व कल्प की रीति से और परमाणुओं से लोक-लोकान्तरों का निर्माण किया जाता है, जिसका अपना प्रयोजन केवल परोपकार को छोड़कर और कुछ भी नहीं है, उस जगदीश्वर के उक्त काम धन्यवाद के योग्य हैं, उनका तुम स्मरण करो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।