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Rigveda Mandal 2 / Sukta 15 / Mantra 1

43 Sukta
10 Mantra
2/15/1
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र घा॒ न्व॑स्य मह॒तो म॒हानि॑ स॒त्या स॒त्यस्य॒ कर॑णानि वोचम्। त्रिक॑द्रुकेष्वपिबत्सु॒तस्या॒स्य मदे॒ अहि॒मिन्द्रो॑ जघान॥

प्र । घ॒ । नु । अ॒स्य॒ । म॒ह॒तः । म॒हानि॑ । स॒त्या । स॒त्यस्य । कर॑णानि । वो॒च॒म् । त्रिऽक॑द्रुकेषु । अ॒पि॒ब॒त् । सु॒तस्य॑ । अ॒स्य । मदे॑ । अहि॑म् । इन्द्रः॑ । ज॒घा॒न॒ ॥

Mantra without Swara
प्र घा न्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्। त्रिकद्रुकेष्वपिबत्सुतस्यास्य मदे अहिमिन्द्रो जघान॥

प्र। घ। नु। अस्य। महतः। महानि। सत्या। सत्यस्य। करणानि। वोचम्। त्रिऽकद्रुकेषु। अपिबत्। सुतस्य। अस्य। मदे। अहिम्। इन्द्रः। जघान॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (इन्द्रः) सूर्य (सुतस्य) सम्पादित किये हुए (अस्य) सोमादि ओषधि के रस को (त्रिकद्रुकेषु) तीन प्रकार की विशेष गतियों से युक्त कर्मों में (अपिबत्) पीता है और (मदे) हर्ष के निमित्त (अहिम्) मेघ को (जघान) मारता है, इस कर्म को अथवा (अस्य) इस (महतः) पूज्य व व्यापक (सत्यस्य) नाशरहित जगदीश्वर के (सत्या) सत्य अविनाशी (महानि) प्रशंसनीय (करणानि) साधन वा कर्मों को (घ) ही मैं (नु) शीघ्र (प्रवोचम्) प्रकर्षता से कहता हूँ, वैसे तुम लोग भी कहो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य जैसे सूर्य किरणों से सबके रस को अपने प्रकाश से उन्नत करता वा शोधता है, वैसे ओषधियों के रस को जो कि रोगनिवारण करने से आनन्द देनेवाला है, उसको सेवते वा परमेश्वर के सत्यगुण, कर्म, स्वभाव और साधनों के अनुकूल कर्मों को करते हैं, वे ही शीघ्र सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब दश चावाले पन्द्रहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान्, सूर्य और परमेश्वर के विषय को कहते हैं।