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Rigveda Mandal 2 / Sukta 14 / Mantra 9

43 Sukta
12 Mantra
2/14/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध्व॑र्यवः॒ कर्त॑ना श्रु॒ष्टिम॑स्मै॒ वने॒ निपू॑तं॒ वन॒ उन्न॑यध्वम्। जु॒षा॒णो हस्त्य॑म॒भि वा॑वशे व॒ इन्द्रा॑य॒ सोमं॑ मदि॒रं जु॑होत॥

अध्व॑र्यवः । कर्त॑न । श्रु॒ष्टिम् । अ॒स्मै॒ । वने॑ । निऽपू॑तम् । वने॑ । उत् । न॒य॒ध्व॒म् । जु॒षा॒णः । हस्त्य॑म् । अ॒भि । वा॒व॒शे॒ । वः॒ । इन्द्रा॑य॒ । सोम॑म् । मदि॒रम् । जु॒हो॒त॒ ॥

Mantra without Swara
अध्वर्यवः कर्तना श्रुष्टिमस्मै वने निपूतं वन उन्नयध्वम्। जुषाणो हस्त्यमभि वावशे व इन्द्राय सोमं मदिरं जुहोत॥

अध्वर्यवः। कर्तन। श्रुष्टिम्। अस्मै। वने। निऽपूतम्। वने। उत्। नयध्वम्। जुषाणः। हस्त्यम्। अभि। वावशे। वः। इन्द्राय। सोमम्। मदिरम्। जुहोत॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अध्वर्यवः) पुरुषार्थी जनो तुम (अस्मै) इस सभापति के लिये (वने) किरणों में (श्रुष्टिम्) शीघ्र (निपूतम्) निरन्तर पवित्र और दुर्गन्ध वा प्रमादपन से रहित पदार्थ (कर्त्तन) करो (वने) और किरणों में (उन्नयध्वम्) उत्कर्ष देओ जो (हस्त्यम्) हस्तों में उत्तम हुए पदार्थ को (जुषाणः) प्रीति करता वा सेवन करता हुआ (मदिरम्) आनन्द देनेवाले (सोमम्) सोमलतादि रस को (अभि, वावशे) प्रत्यक्ष चाहता (तस्मै) उस सभापति के लिये और (वः) तुम लोगों को (इन्द्राय) ऐश्वर्यवान् जन के लिये उक्त पदार्थ को (जुहोत) देओ ॥९॥
Essence
जो वैद्य जन सूर्य किरणों से निष्पन्न हुए ओषधि रस को क्रिया से उत्कृष्ट करके आप सेवते तथा औरों के लिये देते हैं, वे शीघ्र अपने कार्य को सिद्ध कर सकते हैं ॥९॥
Subject
अब क्रियाकौशल विषय को अगले मन्त्र में कहा है।