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Rigveda Mandal 2 / Sukta 14 / Mantra 6

43 Sukta
12 Mantra
2/14/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध्व॑र्यवो॒ यः श॒तं शम्ब॑रस्य॒ पुरो॑ बि॒भेदाश्म॑नेव पू॒र्वीः। यो व॒र्चिनः॑ श॒तमिन्द्रः॑ स॒हस्र॑म॒पाव॑प॒द्भर॑ता॒ सोम॑मस्मै॥

अध्व॑र्यवः । यः । श॒तम् । शम्ब॑रस्य । पुरः॑ । बि॒भेद॑ । अश्म॑नाऽइव । पू॒र्वीः । यः । व॒र्चिनः॑ । श॒तम् । इन्द्रः॑ । स॒हस्र॑म् । अ॒पऽअव॑पत् । भर॑त॒ । सोम॑म् । अ॒स्मै॒ ॥

Mantra without Swara
अध्वर्यवो यः शतं शम्बरस्य पुरो बिभेदाश्मनेव पूर्वीः। यो वर्चिनः शतमिन्द्रः सहस्रमपावपद्भरता सोममस्मै॥

अध्वर्यवः। यः। शतम्। शम्बरस्य। पुरः। बिभेद। अश्मनाऽइव। पूर्वीः। यः। वर्चिनः। शतम्। इन्द्रः। सहस्रम्। अपऽअवपत्। भरत। सोमम्। अस्मै॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अध्वर्यवः) युद्धरूप यज्ञ की सिद्धि करनेवालो तुम लोगों में से (यः) जो (शम्बरस्य) सुख जिससे स्वीकार किया जाता उस मेघ के (शतम्) सौ (पुरः) पुरों को जैसे घड़े को (अश्मनेव) पत्थर से वैसे (बिभेद) छिन्न भिन्न करता है (यः) जो (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् (वर्चिनः) प्रदीप्त अपने सर्व बस से देदीप्यमान राजा के (शतम्) सौ और (सहस्रम्) हजार (पूर्वीः) पहिले हुई प्रजाओं को (अपावपत्) नीचा करता है (अस्मै) इस सेनेश के लिये (सोमम्) ऐश्वर्य को (भरत) धारण करो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो जैसे सूर्य वा बिजुली मेघ की असंख्य नगरियों को छिन्न-भिन्न करता है, पृथिवी पर अपरिमित जल वर्षाता है, वैसे जो प्रजा के लिये ऐश्वर्य का धारण करता है, उसका निरन्तर सत्कार करो ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।