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Rigveda Mandal 2 / Sukta 14 / Mantra 10

43 Sukta
12 Mantra
2/14/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध्व॑र्यवः॒ पय॒सोध॒र्यथा॒ गोः सोमे॑भिरीं पृणता भो॒जमिन्द्र॑म्। वेदा॒हम॑स्य॒ निभृ॑तं म ए॒तद्दित्स॑न्तं॒ भूयो॑ यज॒तश्चि॑केत॥

अध्व॑र्यवः । पय॑सा । ऊधः॑ । यथा॑ । गोः । सोमे॑भिः । ई॒म् । पृ॒ण॒त॒ । भो॒जम् । इन्द्र॑म् । वेद॑ । अ॒हम् । अ॒स्य॒ । निऽभृ॑तम् । मे॒ । ए॒तत् । दित्स॑न्तम् । भूयः॑ । य॒ज॒तः । चि॒के॒त॒ ॥

Mantra without Swara
अध्वर्यवः पयसोधर्यथा गोः सोमेभिरीं पृणता भोजमिन्द्रम्। वेदाहमस्य निभृतं म एतद्दित्सन्तं भूयो यजतश्चिकेत॥

अध्वर्यवः। पयसा। ऊधः। यथा। गोः। सोमेभिः। ईम्। पृणत। भोजम्। इन्द्रम्। वेद। अहम्। अस्य। निऽभृतम्। मे। एतत्। दित्सन्तम्। भूयः। यजतः। चिकेत॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अध्वर्यवः) बड़ी-२ ओषधियों के सिद्ध करनेवाले जनो तुम (यथा) जैसे (गोः) गौ के (पयसा) दूध से (ऊधः) ऐन भरा होता है वैसे (सोमेभिः) खाई हुई सोमादि ओषधियों के साथ (ईम्) जल को पी के (पृणत) तृप्त होओ जैसे (भोजम्) भोजन करनेवाले (इन्द्रम्) ऐश्वर्यवान् को (अहम्) मैं (वेद) जानूँ (अस्य) इसकी (निभृतम्) निश्चित पुष्टि को जानूँ वैसे तुम जानो जिस (मे) मेरे (एतत्) इस पूर्वोक्त पदार्थ के (दित्सन्तम्) देनेवाले का (यजतः) संग करते हुए जनों को जैसे मैं जानूँ वैसे इस विषय को (भूयः) बार-२ जो (चिकेत) जाने उसको तृप्त करो ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्य जैसे गौयें घास आदि को खा कर दूध उत्पन्न करती हैं, वैसे महौषधियों का संग्रह कर श्रेष्ठ औषधियों को सिद्ध करें ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।