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Rigveda Mandal 2 / Sukta 13 / Mantra 6

43 Sukta
13 Mantra
2/13/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यो भोज॑नं च॒ दय॑से च॒ वर्ध॑नमा॒र्द्रादा शुष्कं॒ मधु॑मद्दु॒दोहि॑थ। स शे॑व॒धिं नि द॑धिषे वि॒वस्व॑ति॒ विश्व॒स्यैक॑ ईशिषे॒ सास्यु॒क्थ्यः॑॥

यः । भोज॑नम् । च॒ । दय॑से । च॒ । वर्ध॑नम् । आ॒र्द्रात् । आ । शुष्क॑म् । मधु॑ऽमत् । दु॒दोहि॑थ । सः । शे॒व॒धिम् । नि । द॒धि॒षे॒ । वि॒वस्व॑ति । विश्व॑स्य । एकः॑ । ई॒शि॒षे॒ । सः । अ॒सि॒ । उ॒क्थ्यः॑ ॥

Mantra without Swara
यो भोजनं च दयसे च वर्धनमार्द्रादा शुष्कं मधुमद्दुदोहिथ। स शेवधिं नि दधिषे विवस्वति विश्वस्यैक ईशिषे सास्युक्थ्यः॥

यः। भोजनम्। च। दयसे। च। वर्धनम्। आर्द्रात्। आ। शुष्कम्। मधुऽमत्। दुदोहिथ। सः। शेवधिम्। नि। दधिषे। विवस्वति। विश्वस्य। एकः। ईशिषे। सः। असि। उक्थ्यः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 11 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे जगदीश्वर ! (यः) जो (एकः) एक असहाय अद्वितीय आप (विवस्वति) सूर्य में अभिव्याप्त होते (विश्वस्य) समस्त जगत् के (भोजनम्) पालन (च) और पुरुषार्थ और वृद्धि की (दयसे) रक्षा करते (ईशिषे) और ईश्वरता को प्राप्त हैं वा (शुष्कम्) सूखे पदार्थ को (आर्द्रात्) गीले पदार्थ से (मधुमत्) मधुर गुणयुक्त (दुदोहिथ) परिपूर्ण करते (सः) वह आप (शेवधिम्) निधिरूप पदार्थ को (निदधिषे) निरन्तर धारण करते हैं इस कारण (सः) वह आप (उक्थ्यः) प्रशंसनीयों में प्रसिद्ध (असि) हैं ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो पालना करता हुआ ईश्वर समस्त जगत् का निर्माण कर और उसी की रक्षा कर सिद्धि करनेवाले पदार्थों को देकर समस्त विश्व को सुखों से परिपूर्ण करता है, वह एक ही उपासना के योग्य है ॥६॥
Subject
अब ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।