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Rigveda Mandal 2 / Sukta 13 / Mantra 3

43 Sukta
13 Mantra
2/13/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अन्वेको॑ वदति॒ यद्ददा॑ति॒ तद्रू॒पा मि॒नन्तद॑पा॒ एक॑ ईयते। विश्वा॒ एक॑स्य वि॒नुद॑स्तितिक्षते॒ यस्ताकृ॑णोः प्रथ॒मं सास्यु॒क्थ्यः॑॥

अनु॑ । एकः॑ । व॒द॒ति॒ । यत् । ददा॑ति । तत् । रू॒पा । मि॒नन् । तत्ऽअ॑पाः । एकः॑ । ई॒य॒ते॒ । विश्वाः॑ । एक॑स्य । वि॒ऽनुदः॑ । ति॒ति॒क्ष॒ते॒ । यः । ता । अकृ॑णोः । प्र॒थ॒मम् । सः । अ॒सि॒ । उ॒क्थ्यः॑ ॥

Mantra without Swara
अन्वेको वदति यद्ददाति तद्रूपा मिनन्तदपा एक ईयते। विश्वा एकस्य विनुदस्तितिक्षते यस्ताकृणोः प्रथमं सास्युक्थ्यः॥

अनु। एकः। वदति। यत्। ददाति। तत्। रूपा। मिनन्। तत्ऽअपाः। एकः। ईयते। विश्वाः। एकस्य। विऽनुदः। तितिक्षते। यः। ता। अकृणोः। प्रथमम्। सः। असि। उक्थ्यः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे जगदीश्वर ! (एकः) एकाकी आप (विश्वाः) समस्त विद्याओं के (यत्) जिन (अनुवदति) अनुवादों को करते हैं (तत्) वह साथ (रूपा) नाना प्रकार के रूपों को (मिनत्) छिन्न-भिन्न करते और (तदपाः) वही कर्म जिनका ऐसे होते हुए आप (एकः) एकाकी (ईयते) प्राप्त होते (तितिक्षते) सबका सहन करते (यः) जो (ता) उन उक्त कर्मों का (प्रथमम्) विस्तार जैसे हो वैसे (अकृणोः) करते हैं जिन (विनुदः) प्रेरणा करनेवाले (एकस्य) एक आपका यह जगत् है (सः) वह आप (उक्थ्यः) कथनीय जनों में प्रसिद्ध (असि) हैं ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अद्वितीय जगदीश्वर हम लोगों के कल्याण के लिये सृष्टि की आदि में वेदों का उपदेश करता, संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करता है, जो अन्तर्यामी अपारशक्ति सब अपवादों को सहता है, उसी सर्वोत्तम प्रशंसा योग्य की आप लोग प्रशंसा करें ॥३॥
Subject
फिर ईश्वर विषय को अगले मन्त्र में कहा है।