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Rigveda Mandal 2 / Sukta 12 / Mantra 3

43 Sukta
15 Mantra
2/12/3
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो ह॒त्वाहि॒मरि॑णात्स॒प्त सिन्धू॒न्यो गा उ॒दाज॑दप॒धा ब॒लस्य॑। यो अश्म॑नोर॒न्तर॒ग्निं ज॒जान॑ सं॒वृक्स॒मत्सु॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

यः । ह॒त्वा । अहि॑म् । अरि॑णात् । स॒प्त । सिन्धू॑न् । यः । गाः । उ॒त्ऽआज॑त् । अ॒प॒ऽधा । व॒लस्य॑ । यः । अश्म॑नोः । अ॒न्तः । अ॒ग्निम् । ज॒जान॑ । स॒म्ऽवृक् । स॒मत्ऽसु॑ । सः । ज॒ना॒सः॒ । इन्द्रः॑ ॥

Mantra without Swara
यो हत्वाहिमरिणात्सप्त सिन्धून्यो गा उदाजदपधा बलस्य। यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान संवृक्समत्सु स जनास इन्द्रः॥

यः। हत्वा। अहिम्। अरिणात्। सप्त। सिन्धून्। यः। गाः। उत्ऽआजत्। अपऽधा। बलस्य। यः। अश्मनोः। अन्तः। अग्निम्। जजान। सम्ऽवृक्। समत्ऽसु। सः। जनासः। इन्द्रः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जनासः) विद्वानो ! (यः) जो (अहिम्) मेघ को (हत्वा) मार (सप्त) सात प्रकार के (सिन्धून्) समुद्रों को वा नदियों को (अरिणात्) चलाता है (यः) जो (गाः) पृथिवियों को (उदाजत्) ऊपर प्रेरित करता अर्थात् एक के ऊपर एक को नियम से चला रहा (यः) जो (बलस्य) बल को (अपधा) धारण करनेवाला और जो (अश्मनः) पाषाणों वा मेघों के (अन्तः) बीच (अग्निम्) अग्नि को (जजान) उत्पन्न करता तथा (समत्सु) संग्रामो में (संवृक्) सब पदार्थों को अलग कराता है (सः) वह (इन्द्रः) इन्द्र नामक सूर्यलोक है यह जानना चाहिये ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सूर्यलोक मेघ को वर्षाकर समुद्रों को भरता है, सब भूगोलों को अपने प्रति खैंचता है, अपनी किरणों से मेघ और समीपस्थ पाषाण के बीच ऊष्मा को उत्पन्न करता है वह अग्निरूप है, यह जानना चाहिये ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।