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Rigveda Mandal 2 / Sukta 11 / Mantra 7

43 Sukta
21 Mantra
2/11/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
हरी॒ नु त॑ इन्द्र वा॒जय॑न्ता घृत॒श्चुतं॑ स्वा॒रम॑स्वार्ष्टाम्। वि स॑म॒ना भूमि॑रप्रथि॒ष्टारं॑स्त॒ पर्व॑तश्चित्सरि॒ष्यन्॥

हरी॒ इति॑ । नु । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वा॒जय॑न्ता । घृ॒त॒ऽश्चुत॑म् । स्वा॒रम् । अ॒स्वा॒र्ष्टा॒म् । वि । स॒म॒ना । भूमिः॑ । अ॒प्र॒थि॒ष्ट । अरं॑स्त । पर्व॑तः । चि॒त् । स॒रि॒ष्यन् ॥

Mantra without Swara
हरी नु त इन्द्र वाजयन्ता घृतश्चुतं स्वारमस्वार्ष्टाम्। वि समना भूमिरप्रथिष्टारंस्त पर्वतश्चित्सरिष्यन्॥

हरी इति। नु। ते। इन्द्र। वाजयन्ता। घृतऽश्चुतम्। स्वारम्। अस्वार्ष्टाम्। वि। समना। भूमिः। अप्रथिष्ट। अरंस्त। पर्वतः। चित्। सरिष्यन्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य के समान प्रतापी राजन् ! जिन (ते) आपके (घृतश्चुतम्) जल से प्राप्त हुए (स्वारम्) उपताप वा शब्द को (वाजयन्ता) चलते हुए सूर्य के (हरी) हरणशील किरणों के समान विद्या और विनय को जो (अस्वार्ष्टाम्) शब्दायमान करते अर्थात् व्यवहार में लाते उनके साथ (भूमिः) भूमि के समान आप (नु) शीघ्र (वि,अप्रथिष्ट) प्रख्यात हूजिये और (अरंस्त) सुख में रमण कीजिये तथा (सरिष्यन्) गमन करनेवाले होते हुए (पर्वतः) मेघ के (चित्) समान (समना) संग्रामों को जीतो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजपुरुष सूर्य के समान प्रजाजनों के उपकार करने वा मेघ के समान आनन्द देने और उत्तम बलवाले हैं, वे ही शत्रुओं को जीत सकते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।