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Rigveda Mandal 2 / Sukta 11 / Mantra 6

43 Sukta
21 Mantra
2/11/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स्तवा॒ नु त॑ इन्द्र पू॒र्व्या म॒हान्यु॒त स्त॑वाम॒ नूत॑ना कृ॒तानि॑। स्तवा॒ वज्रं॑ बा॒ह्वोरु॒शन्तं॒ स्तवा॒ हरी॒ सूर्य॑स्य के॒तू॥

स्तव॑ । नु । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । पू॒र्व्या । म॒हानि॑ । उ॒त । स्त॒वा॒म॒ । नूत॑ना । कृ॒तानि॑ । स्तव॑ । वज्र॑म् । बा॒ह्वोः । उ॒शन्त॑म् । स्तव॑ । हरी॒ इति॑ । सूर्य॑स्य । के॒तू इति॑ ॥

Mantra without Swara
स्तवा नु त इन्द्र पूर्व्या महान्युत स्तवाम नूतना कृतानि। स्तवा वज्रं बाह्वोरुशन्तं स्तवा हरी सूर्यस्य केतू॥

स्तव। नु। ते। इन्द्र। पूर्व्या। महानि। उत। स्तवाम। नूतना। कृतानि। स्तव। वज्रम्। बाह्वोः। उशन्तम्। स्तव। हरी इति। सूर्यस्य। केतू इति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 4 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) प्रशंसायुक्त राजन् ! हम लोग (ते) आपके (पूर्व्या) प्राचीन (महानि) प्रशंसनीय बड़े-बड़े कामों की (नु) शीघ्र (स्तव) स्तुति अर्थात् प्रशंसा करें (उत) और (नूतना) नवीन (कृतानि) किये हुओं की (स्तवाम) प्रशंसा करें, तथा (बाह्वोः) भुजाओं में (वज्रम्) शस्त्र और अस्त्रों की (उशन्तम्) चाहना करते हुए आपकी (स्तव) स्तुति प्रशंसा करें तथा (सूर्यस्य) सूर्य की (केतू) किरणों के समान जो (हरी) धारणाकर्षण गुणयुक्त कर्मों की (स्तव) प्रशंसा करें ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। व्यतीत और वर्त्तमान आप्त धर्मात्मा सज्जनों ने जो धर्मयुक्त काम किये वा करते हैं, उन्हीं का अनुष्ठान और जनों को भी करना चाहिये ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।