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Rigveda Mandal 2 / Sukta 11 / Mantra 19

43 Sukta
21 Mantra
2/11/19
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सने॑म॒ ये त॑ ऊ॒तिभि॒स्तर॑न्तो॒ विश्वाः॒ स्पृध॒ आर्ये॑ण॒ दस्यू॑न्। अ॒स्मभ्यं॒ तत्त्वा॒ष्ट्रं वि॒श्वरू॑प॒मर॑न्धयः सा॒ख्यस्य॑ त्रि॒ताय॑॥

सने॑म । ये । ते॒ । ऊ॒तिऽभिः॑ । तर॑न्तः । विश्वाः॑ । स्पृधः॑ । आर्ये॑ण । दस्यू॑न् । अ॒स्मभ्य॑म् । तत् । त्वा॒ष्ट्रम् । वि॒श्वऽरू॑पम् । अर॑न्धयः । सा॒ख्यस्य॑ । त्रि॒ताय॑ ॥

Mantra without Swara
सनेम ये त ऊतिभिस्तरन्तो विश्वाः स्पृध आर्येण दस्यून्। अस्मभ्यं तत्त्वाष्ट्रं विश्वरूपमरन्धयः साख्यस्य त्रिताय॥

सनेम। ये। ते। ऊतिऽभिः। तरन्तः। विश्वाः। स्पृधः। आर्येण। दस्यून्। अस्मभ्यम्। तत्। त्वाष्ट्रम्। विश्वऽरूपम्। अरन्धयः। साख्यस्य। त्रिताय॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 4

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Meaning
हे सेनापति ! (ये) जो (ते) आपकी (ऊतिभिः) रक्षा आदि कामों की करनेवाली सेनाओं से (विश्वाः) समस्त (स्पृधः) स्पर्द्धा करनेवालों को (तरन्तः) उल्लंघन करते हुए हम लोग (त्रिताय) त्रिविध अर्थात् शारीरिक वाचिक और मानसिक सुख जिसको प्राप्त उसके लिये (आर्य्येण) उत्तम विद्या और धर्म सामर्थ्य के साथ (दस्यून्) डाकुओं को जीतें जो (साख्यस्य) मित्रपन वा मित्रकर्म करने का (विश्वरूपम्) विविध स्वरूप (त्वाष्ट्रम्) प्रकाशमान का रचा हुआ है उसको (सनेम) अलग-अलग करें (तत्) उसको आप (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये सिद्ध करो और डाकुओं को (अरन्धयः) नष्ट करो ॥१९॥
Essence
जो मनुष्य किये हुए को जाननेवाले विद्वान् को सेनापति का अधिकार कर श्रेष्ठ पुरुषों के साथ कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य कामों को अच्छे प्रकार निश्चय कर प्रजा सुख की सिद्धि करें, वे सब सुखों को प्राप्त होवें ॥१९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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