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Rigveda Mandal 2 / Sukta 11 / Mantra 18

43 Sukta
21 Mantra
2/11/18
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
धि॒ष्वा शवः॑ शूर॒ येन॑ वृ॒त्रम॒वाभि॑न॒द्दानु॑मौर्णवा॒भम्। अपा॑वृणो॒र्ज्योति॒रार्या॑य॒ नि स॑व्य॒तः सा॑दि॒ दस्यु॑रिन्द्र॥

धि॒ष्व । शवः॑ । शू॒र॒ । येन॑ । वृ॒त्रम् । अ॒व॒ऽअभि॑नत् । दानु॑म् । औ॒र्ण॒ऽवा॒भम् । अप॑ । अ॒वृ॒णोः॒ । ज्योतिः॑ । आर्या॑य । नि । स॒व्य॒तः । सा॒दि॒ । दस्युः॑ । इ॒न्द्र॒ ॥

Mantra without Swara
धिष्वा शवः शूर येन वृत्रमवाभिनद्दानुमौर्णवाभम्। अपावृणोर्ज्योतिरार्याय नि सव्यतः सादि दस्युरिन्द्र॥

धिष्व। शवः। शूर। येन। वृत्रम्। अवऽअभिनत्। दानुम्। और्णऽवाभम्। अप। अवृणोः। ज्योतिः। आर्याय। नि। सव्यतः। सादि। दस्युः। इन्द्र॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) दुःखविनाशक (इन्द्र) सूर्य के समान वर्त्तमान सेनापति ! आप (येन) जिससे (शवः) बल को (धिष्व) धारण करो उससे जैसे सूर्य (दानुम्) जल देनेवाले (वृत्रम्) मेघ को (और्णवाभम्) उर्णा जिसकी नाभि में होती उसके पुत्र के समान अर्थात् जैसे वह किसी की देह का विदारण करे वैसे (अभिनत्) छिन्न-भिन्न करता है और (सव्यतः) दाहिनी ओर से (ज्योतिः) प्रकाश कर अन्धकार को (नि,अप,अवृणोः) निरन्तर दूर करता है वैसे (आर्य्याय) उत्तम के लिये साधारण होओ जो (दस्युः) दूसरे के पदार्थों को हरनेवाला है उसका विनाश करो, ऐसे युद्ध के बीच विजय (सादि) साधना चाहिये ॥१८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे सूर्य अन्धकार को वैसे अन्याय को निवृत्त कर सज्जनों के हृदयों में सुख की प्राप्ति करा निरन्तर बल बढ़ावें ॥१८॥
Subject
अब सेनापति के गुणों अगले मन्त्र में कहा है।