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Rigveda Mandal 2 / Sukta 11 / Mantra 15

43 Sukta
21 Mantra
2/11/15
Devata- इन्द्र: Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
व्यन्त्विन्नु येषु॑ मन्दसा॒नस्तृ॒पत्सोमं॑ पाहि द्र॒ह्यदि॑न्द्र। अ॒स्मान्त्सु पृ॒त्स्वा त॑रु॒त्राव॑र्धयो॒ द्यां बृ॒हद्भि॑र॒र्कैः॥

व्यन्तु॑ । इत् । नु । येषु॑ । म॒न्द॒सा॒नः । तृ॒पत् । सोम॑म् । पा॒हि॒ । द्र॒ह्यत् । इ॒न्द्र॒ । अ॒स्मान् । सु । पृ॒त्ऽसु । आ । त॒रु॒त्र॒ । अव॑र्धयः । द्याम् । बृ॒हत्ऽभिः॑ । अ॒र्कैः ॥

Mantra without Swara
व्यन्त्विन्नु येषु मन्दसानस्तृपत्सोमं पाहि द्रह्यदिन्द्र। अस्मान्त्सु पृत्स्वा तरुत्रावर्धयो द्यां बृहद्भिरर्कैः॥

व्यन्तु। इत्। नु। येषु। मन्दसानः। तृपत्। सोमम्। पाहि। द्रह्यत्। इन्द्र। अस्मान्। सु। पृत्ऽसु। आ। तरुत्र। अवर्धयः। द्याम्। बृहत्ऽभिः। अर्कैः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 5 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (तरुत्र) अविद्या से तारनेवाले (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् विद्वान् ! जैसे सूर्यमण्डल (बृहद्भिः) बड़ी-बड़ी (अर्कैः) किरणों से (द्याम्) प्रकाश को (नु,आ,अवर्धयः) शीघ्र अच्छे प्रकार बढ़ाता है, वैसे आप (अस्मान्) हम लोगों की (पृत्सु) संग्रामो में रक्षा कीजिये (येषु) जिनमें विद्वान् जन (सोमम्) ऐश्वर्य की (व्यन्तु) कामना करें उनमें (मन्दसानः) आनन्द को प्राप्त (तृपत्) तृप्त और (द्रह्यत्) दृढ़ होते हुए (इत्) ही आप ऐश्वर्य की (सुपाहि) अच्छे प्रकार रक्षा करें ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य जिन विद्वान् जनों में निवास करते और ऐश्वर्य को प्राप्त होकर तृप्त होते हुए औरों को तृप्त करते हैं, उनमें वे सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं ॥१५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।