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Rigveda Mandal 2 / Sukta 10 / Mantra 6

43 Sukta
6 Mantra
2/10/6
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ज्ञे॒या भा॒गं स॑हसा॒नो वरे॑ण॒ त्वादू॑तासो मनु॒वद्व॑देम। अनू॑नम॒ग्निं जु॒ह्वा॑ वच॒स्या म॑धु॒पृचं॑ धन॒सा जो॑हवीमि॥

ज्ञे॒याः । भा॒गम् । स॒ह॒सा॒नः । वरे॑ण । त्वाऽदू॑तासः । म॒नु॒ऽवत् । व॒दे॒म॒ । अनू॑नम् । अ॒ग्निम् । जु॒ह्वा॑ । व॒च॒स्या । म॒धु॒ऽपृच॑म् । ध॒न॒ऽसाः । जो॒ह॒वी॒मि॒ ॥

Mantra without Swara
ज्ञेया भागं सहसानो वरेण त्वादूतासो मनुवद्वदेम। अनूनमग्निं जुह्वा वचस्या मधुपृचं धनसा जोहवीमि॥

ज्ञेयाः। भागम्। सहसानः। वरेण। त्वाऽदूतासः। मनुऽवत्। वदेम। अनूनम्। अग्निम्। जुह्वा। वचस्या। मधुऽपृचम्। धनऽसाः। जोहवीमि॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (वरेण) श्रेष्ठ व्यवहार से (भागम्) सेवने योग्य पदार्थ को (सहसानः) सहते हुए आप जैसे मैं (वचस्या) वचनों में और (जुह्वा) ग्रहण करने में उत्तम क्रिया से (मधुपृचम्) मधुरादि पदार्थ सम्बन्धी (अनूनम्) बहुत (अग्निम्) अग्नि को (जोहवीमि) निरन्तर स्वीकार करता हूँ वैसे तुम ग्रहण करो जैसे (त्वादूतासः) तुम जिन महात्माओं के दूत हो (ज्ञेयाः) वे जानने योग्य (धनसाः) धनादि पदार्थों का विभाग करनेवाले विद्वान् जन (मनुवत्) विद्वान् के समान इसको उपदेश करें, वैसे इसको हम लोग भी (वदेम) कहें ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे आप्त विद्वान् जन अग्न्यादि पदार्थविद्या को जानकर औरों के हित के लिये उपदेश करते हैं, वैसे हमलोग भी विद्या का उपदेश करें ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये ॥ यह दसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।