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Rigveda Mandal 2 / Sukta 10 / Mantra 5

43 Sukta
6 Mantra
2/10/5
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यञ्चं॑ जिघर्म्यर॒क्षसा॒ मन॑सा॒ तज्जु॑षेत। मर्य॑श्रीः स्पृह॒यद्व॑र्णो अ॒ग्निर्नाभि॒मृशे॑ त॒न्वा॒३॒॑ जर्भु॑राणः॥

आ । वि॒श्वतः॑ । प्र॒त्यञ्च॑म् । जि॒घ॒र्मि॒ । अ॒र॒क्षसा॑ । मन॑सा । तत् । जु॒षे॒त॒ । मर्य॑ऽश्रीः । स्पृ॒ह॒यत्ऽव॑र्णः । अ॒ग्निः । न । अ॒भि॒ऽमृशे॑ । त॒न्वा॑ । जर्भु॑राणः ॥

Mantra without Swara
आ विश्वतः प्रत्यञ्चं जिघर्म्यरक्षसा मनसा तज्जुषेत। मर्यश्रीः स्पृहयद्वर्णो अग्निर्नाभिमृशे तन्वा३ जर्भुराणः॥

आ। विश्वतः। प्रत्यञ्चम्। जिघर्मि। अरक्षसा। मनसा। तत्। जुषेत। मर्यऽश्रीः। स्पृहयत्ऽवर्णः। अग्निः। न। अभिऽमृशे। तन्वा। जर्भुराणः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वान् ! आप जैसे मैं (अरक्षसा) उत्तम भाव से वा (मनसाः) विज्ञान से जिस (प्रत्यञ्चम्) प्रत्येक पदार्थ को प्राप्त होते हुए अग्नि को (विश्वतः) सबओर से (आ,जिघर्मि) अच्छे प्रकार प्रदीप्त करता हूँ और (मर्यश्रीः) जिससे मरणधर्मा प्राणियों की शोभा और जो (स्पृहयद्वर्णः) कांक्षा सी करता हुआ जिसका वर्ण (तन्वा) विस्तृत शरीर से (जर्भुराणः) निरन्तर पदार्थों को धारण करता हुआ (अग्निः) अग्नि विद्यमान है (तत्) उसको (न,अभिमृशे) आगे नहीं सह सकता हूँ, वैसे इसका (जुषेत) सेवन करो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो शुद्धान्तःकरण जन सुन्दर शोभा करनेवाले और घृतादि आहुतियों के ग्राहक, सबके धारण करनेवाले, सब रूपों के प्रकाशक और न सहने योग्य अग्नि को सिद्ध करते हैं, वे श्रीमान् होते हैं ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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