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Rigveda Mandal 2 / Sukta 10 / Mantra 4

43 Sukta
6 Mantra
2/10/4
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जिघ॑र्म्य॒ग्निं ह॒विषा॑ घृ॒तेन॑ प्रतिक्षि॒यन्तं॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। पृ॒थुं ति॑र॒श्चा वय॑सा बृ॒हन्तं॒ व्यचि॑ष्ठ॒मन्नै॑ रभ॒सं दृशा॑नम्॥

जिघ॑र्मि । अ॒ग्निम् । ह॒विषा॑ । घृ॒तेन॑ । प्र॒ति॒ऽक्षि॒यन्त॑म् । भुव॑नानि । विश्वा॑ । पृ॒थुम् । ति॒र॒श्चा । वय॑सा । बृ॒हन्त॑म् । व्यचि॑ष्ठम् । अन्नैः॑ । र॒भ॒सम् । दृशा॑नम् ॥

Mantra without Swara
जिघर्म्यग्निं हविषा घृतेन प्रतिक्षियन्तं भुवनानि विश्वा। पृथुं तिरश्चा वयसा बृहन्तं व्यचिष्ठमन्नै रभसं दृशानम्॥

जिघर्मि। अग्निम्। हविषा। घृतेन। प्रतिऽक्षियन्तम्। भुवनानि। विश्वा। पृथुम्। तिरश्चा। वयसा। बृहन्तम्। व्यचिष्ठम्। अन्नैः। रभसम्। दृशानम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! जैसे (विश्वा) समग्र (भुवनानि) जिनमें प्राणी उत्पन्न होते हैं उन लोकों और (प्रतिक्षियन्तम्) पदार्थ-पदार्थ के प्रति वसते हुए (तिरश्चा) तिरछे सब पदार्थों में वांकेपन से रहनेवाले (वयसा) मनोहर जीवन के साथ (पृथुम्) बढ़े हुए (बृहन्तम्) वा बढ़ते हुए (व्यचिष्ठम्) अतीव सब पदार्थों में व्याप्त और (अन्नैः) पृथिव्यादिकों के साथ (रसभम्) वेगवान् (दृशानम्) देखा जाता वा अपने से अन्य पदार्थों को दिखानेवाले (अग्निम्) अग्नि को मैं (हविषा) होमने योग्य सुगन्धि आदि पदार्थ वा (घृतेन) घी से मैं (जिघर्मि) प्रदीप्त करता हूँ, वैसे आप भी कीजिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य समस्त मूर्तिमान् पदार्थों में ठहरे हुए बिजुलीरूप अग्नि को साधनों से अच्छे प्रकार ग्रहण कर इसमें सुगन्धि आदि पदार्थ का होम करते हैं, वे अनन्त सुख को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।