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Rigveda Mandal 2 / Sukta 10 / Mantra 3

43 Sukta
6 Mantra
2/10/3
Devata- अग्निः Rishi- गृत्समदः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त्ता॒नाया॑मजनय॒न्त्सुषू॑तं॒ भुव॑द॒ग्निः पु॑रु॒पेशा॑सु॒ गर्भः॑। शिरि॑णायां चिद॒क्तुना॒ महो॑भि॒रप॑रीवृतो वसति॒ प्रचे॑ताः॥

उ॒त्ता॒नाया॑म् । अ॒ज॒न॒य॒न् । सुऽसू॑तम् । भुव॑त् । अ॒ग्निः । पु॒रु॒ऽपेशा॑सु । गर्भः॑ । शिरि॑णायाम् । चि॒त् । अ॒क्तुना॑ । महः॑ऽभिः । अप॑रिऽवृतः । व॒स॒ति॒ । प्रऽचे॑ताः ॥

Mantra without Swara
उत्तानायामजनयन्त्सुषूतं भुवदग्निः पुरुपेशासु गर्भः। शिरिणायां चिदक्तुना महोभिरपरीवृतो वसति प्रचेताः॥

उत्तानायाम्। अजनयन्। सुऽसूतम्। भुवत्। अग्निः। पुरुऽपेशासु। गर्भः। शिरिणायाम्। चित्। अक्तुना। महःऽभिः। अपरिऽवृतः। वसति। प्रऽचेताः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 6 Varga » 2 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अक्तुना) रात्रि और (महोभिः) बड़े-बड़े लोकों के साथ (अपरिवृतः) सब ओर से न स्वीकार किया हुआ (प्रचेतः) जो सोते प्राणियों को प्रबोधित कराता तु-तु में यज्ञ करनेवाले जन जिस (पुरुपेशासु) बहुत रूपोंवाली ओषधियों में (सुसूतम्) सुन्दरता से उत्पन्न हुए अग्नि को (अजनयन्) प्रकट करते जो (उत्तानायाम्) उत्ताने के समान सोती सी और (शिरिणायाम्) नष्ट हुई पृथिवी में (गर्भः) गर्भ के समान स्थित (अग्निः) अग्नि बिजुलीरूप (भुवत्) होता और (वसति) निवास करता है, उस अग्नि को (चित्) निश्चय करके प्रयुक्त करो अर्थात् कलाघरों में लगाओ ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो! जो अग्नि विद्यमान और नष्ट हुई पृथिवी में गर्भरूप विद्यमान है, उसी की विद्या को जानो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।