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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 8

43 Sukta
16 Mantra
2/1/8
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्ने॒ दम॒ आ वि॒श्पतिं॒ विश॒स्त्वां राजा॑नं सुवि॒दत्र॑मृञ्जते। त्वं विश्वा॑नि स्वनीक पत्यसे॒ त्वं स॒हस्रा॑णि श॒ता दश॒ प्रति॑॥

त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । दमे॑ । आ । वि॒श्पति॑म् । विशः॑ । त्वाम् । राजा॑नम् । सु॒ऽवि॒दत्र॑म् । ऋ॒ञ्ज॒ते॒ । त्वम् । विश्वा॑नि । सु॒ऽअ॒नी॒क॒ । प॒त्य॒से॒ । त्वम् । स॒हस्रा॑णि । श॒ता । दश॑ । प्रति॑ ॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने दम आ विश्पतिं विशस्त्वां राजानं सुविदत्रमृञ्जते। त्वं विश्वानि स्वनीक पत्यसे त्वं सहस्राणि शता दश प्रति॥

त्वाम्। अग्ने। दमे। आ। विश्पतिम्। विशः। त्वाम्। राजानम्। सुऽविदत्रम्। ऋञ्जते। त्वम्। विश्वानि। सुऽअनीक। पत्यसे। त्वम्। सहस्राणि। शता। दश। प्रति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान प्रतापवान् (विश्पतिम्) प्रजा की पालना करनेवाले ! (त्वाम्) (आपको) (विशः) प्रजाजन (दमे) निज घर में (आञ्जते) सब और से प्रसिद्ध करते हैं अर्थात् प्रजापति मानते हैं। और (सुविदत्रम्) सुन्दर देनेवाले (त्वाम्) (आपको) (राजानम्) अपना स्वामी प्रसिद्ध करते हैं। हे (स्वनीक) सुन्दर सेना रखनेवाले ! (त्वम्) आप (विश्वानि) समस्त पदार्थों को (पत्यसे) पतिभाव को प्राप्त होते हैं। और (त्वम्) आप (सहस्राणि) (सहस्रों) (शता) सैकड़ों और (दश) दहाइयों के (प्रति) प्रति पतिभाव को प्राप्त होते हैं ॥८॥
Essence
वही राजा होने योग्य है, जिसको समस्त प्रजाजन स्वीकार करें। वही सेनापति होने को योग्य है, जो दश वा सौ वा सहस्र वीरों के साथ युद्ध कर सकता है ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।