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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 5

43 Sukta
16 Mantra
2/1/5
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने॒ त्वष्टा॑ विध॒ते सु॒वीर्यं॒ तव॒ ग्नावो॑ मित्रमहः सजा॒त्य॑म्। त्वमा॑शु॒हेमा॑ ररिषे॒ स्वश्व्यं॒ त्वं न॒रां शर्धो॑ असि पुरू॒वसुः॑॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । त्वष्टा॑ । वि॒ध॒ते । सु॒ऽवीर्य॑म् । तव॑ । ग्नावः॑ । मि॒त्र॒ऽम॒हः॒ । स॒ऽजा॒त्य॑म् । त्वम् । आ॒शु॒ऽहेमा॑ । र॒रि॒षे॒ । सु॒ऽअश्व्य॑म् । त्वम् । न॒राम् । शर्धः॑ । अ॒सि॒ । पु॒रु॒ऽवसुः॑ ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने त्वष्टा विधते सुवीर्यं तव ग्नावो मित्रमहः सजात्यम्। त्वमाशुहेमा ररिषे स्वश्व्यं त्वं नरां शर्धो असि पुरूवसुः॥

त्वम्। अग्ने। त्वष्टा। विधते। सुऽवीर्यम्। तव। ग्नावः। मित्रऽमहः। सऽजात्यम्। त्वम्। आशुऽहेमा। ररिषे। सुऽअश्व्यम्। त्वम्। नराम्। शर्धः। असि। पुरुऽवसुः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वान् (त्वष्टा) अज्ञान का विनाश करनेवाले ! (त्वम्) आप (विधते) सेवा करते हुए मनुष्य के लिये (सुवीर्यम्) उत्तम पराक्रम को देते हैं। हे (मित्रमहः) मित्रों का सत्कार करनेवाले (ग्नावः) प्रशंसित वाणी से युक्त जन (तव) आपका (सजात्यम्) समान जातियों में प्रसिद्ध हुआ प्रेम है (आशुहेमा) शीघ्रकारी जनों को वृद्धि देनेवाले (त्वम्) आप (स्वश्व्यम्) सुन्दर अग्न्यादि पदार्थों में प्रसिद्ध हुए बल को (रिरिषे) देते हैं सो (त्वम्) आप (पुरुवसुः) बहुतों को निवास देनेवाले (नराम्) मनुष्यों के (शर्धः) बल के बढ़ानेवाले(असि) हैं ॥५॥
Essence
जिस पुरुष की सत्यवाणी और परार्थ पराक्रम है, वह राजजनों में प्रशंसायुक्त होता है ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।