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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 3

43 Sukta
16 Mantra
2/1/3
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्न॒ इन्द्रो॑ वृष॒भः स॒ताम॑सि॒ त्वं विष्णु॑रुरुगा॒यो न॑म॒स्यः॑ । त्वं ब्र॒ह्मा र॑यि॒विद्ब्र॑ह्मणस्पते॒ त्वं वि॑धर्तः सचसे॒ पुरं॑ध्या॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । इन्द्रः॑ । वृ॒ष॒भः । स॒ताम् । अ॒सि॒ । त्वम् । विष्णुः॑ । उ॒रु॒ऽगा॒यः । न॒म॒स्यः॑ । त्वम् । ब्र॒ह्मा । र॒यि॒ऽवित् । ब्र॒ह्म॒णः॒ । प॒ते॒ । त्वम् । वि॒ध॒र्त॒रिति॑ विऽधर्तः । स॒च॒से॒ । पुर॑म्ऽध्या ॥

Mantra without Swara
त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः । त्वं ब्रह्मा रयिविद्ब्रह्मणस्पते त्वं विधर्तः सचसे पुरंध्या॥

त्वम्। अग्ने। इन्द्रः। वृषभः। सताम्। असि। त्वम्। विष्णुः। उरुऽगायः। नमस्यः। त्वम्। ब्रह्मा। रयिऽवित्। ब्रह्मणः। पते। त्वम्। विधर्तरिति विऽधर्तः। सचसे। पुरम्ऽध्या॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) सूर्य के समान वर्त्तमान ! (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् (वृषभः) दुष्टों के सामर्थ्य को विनाशनेवाले (त्वम्) आप (सताम्) सत्पुरुषों के बीच (नमस्यः)सत्कार करने योग्य (असि) हैं, (विष्णु) जगदीश्वर के समान (त्वम्) आप सज्जनों में (उरुगायः) बहुतों से कीर्त्तन किये हुए हैं। हे (ब्रह्मणस्पते) वेदविद्या का प्रचार करनेवाले ! जो (त्वम्) आप (रयिवित्) पदार्थविद्या के जानने (ब्रह्मा) समस्त वेद के पढ़नेवाले हैं। हे (विधर्त्तः) जो नाना प्रकार के शुभ गुणों को धारण करनेवाले (त्वम्) आप (पुरन्ध्या) पूर्ण विद्या के धारण करनेवाली स्त्री उसके साथ (सचसे) सम्बन्ध करते हैं ॥३॥
Essence
जो मनुष्य ब्रह्मचर्य से आप्त विद्वानों के समीप से विद्या शिक्षा को प्राप्त हुआ ईश्वर के समान उपकारदृष्टि से प्रशंसा और सत्कार को प्राप्त हुआ प्रतिदिन उत्तम बुद्धि से समस्त शुभ गुण, कर्म और स्वभावों को धारण करता है, वह सम्पूर्ण विद्यावान् होता है ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।