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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 16

43 Sukta
16 Mantra
2/1/16
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ये स्तो॒तृभ्यो॒ गोअ॑ग्रा॒मश्व॑पेशस॒मग्ने॑ रा॒तिमु॑पसृ॒जन्ति॑ सू॒रयः॑। अ॒स्माञ्च॒ तांश्च॒ प्र हि नेषि॒ वस्य॒ आ बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

ये । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । गोऽअ॑ग्राम् । अश्व॑ऽपेशसम् । अग्ने॑ । रा॒तिम् । उ॒प॒ऽसृ॒जन्ति॑ । सू॒रयः॑ । अ॒स्मान् । च॒ । तान् । च॒ । प्र । हि । नेषि॑ । वस्यः॑ । आ । बृ॒हत् । व॒दे॒म॒ । वि॒दथे॑ । सु॒ऽवीराः॑ ॥

Mantra without Swara
ये स्तोतृभ्यो गोअग्रामश्वपेशसमग्ने रातिमुपसृजन्ति सूरयः। अस्माञ्च तांश्च प्र हि नेषि वस्य आ बृहद्वदेम विदथे सुवीराः॥

ये। स्तोतृऽभ्यः। गोऽअग्राम्। अश्वऽपेशसम्। अग्ने। रातिम्। उपऽसृजन्ति। सूरयः। अस्मान्। च। तान्। च। प्र। हि। नेषि। वस्यः। आ। बृहत्। वदेम। विदथे। सुऽवीराः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! आप (ये) जो (सूरयः) विद्या ज्ञान चाहते हुए जन (स्तोतृभ्यः) समस्त विद्या के अध्यापक विद्वानों के लिए (गोअग्राम्) जिसमें इन्द्रिय अग्रगन्ता हों (अश्वपेशसम्) उस शीघ्रगामी प्राणी के समान रूपवाली (रातिम्) विद्यादान क्रिया को (उपसृजन्ति) देते हैं। (तान् च) उनको और (अस्माञ्च) हम लोगों को भी (वस्यः) अत्युत्तम निवासस्थान (आप्रनेषिहि) अच्छे प्रकार उत्तमता से प्राप्त करते हो इसी से (सुवीराः) उत्तम शूरतादि गुणों से युक्त हम लोग (विदथे) विवाद संग्राम में (बृहत्) बहुत (वदेम) कहें ॥१६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् सर्वोत्तम विद्यादान देके हमको तथा औरों को विद्वान् करते हैं, वैसे हमको भी चाहिये कि उनको सदा प्रसन्न करें ॥१६॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से विद्वान् और विद्यार्थियों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥ यह दूसरे मण्डल में प्रथम सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।