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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 15

43 Sukta
16 Mantra
2/1/15
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वं तान्त्सं च॒ प्रति॑ चासि म॒ज्मनाग्ने॑ सुजात॒ प्र च॑ देव रिच्यसे। पृ॒क्षो यदत्र॑ महि॒ना वि ते॒ भुव॒दनु॒ द्यावा॑पृथि॒वी रोद॑सी उ॒भे॥

त्वम् । तान् । सम् । च॒ । प्रति॑ । च॒ । अ॒सि॒ । म॒ज्मना॑ । अग्ने॑ । सु॒ऽजा॒त॒ । प्र । च॒ । दे॒व॒ । रि॒च्य॒से॒ । पृ॒क्षः । यत् । अत्र॑ । म॒हि॒ना । वि । ते॒ । भुव॑त् । अनु॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । रोद॑सी इति॑ । उ॒भे इति॑ ॥

Mantra without Swara
त्वं तान्त्सं च प्रति चासि मज्मनाग्ने सुजात प्र च देव रिच्यसे। पृक्षो यदत्र महिना वि ते भुवदनु द्यावापृथिवी रोदसी उभे॥

त्वम्। तान्। सम्। च। प्रति। च। असि। मज्मना। अग्ने। सुऽजात। प्र। च। देव। रिच्यसे। पृक्षः। यत्। अत्र। महिना। वि। ते। भुवत्। अनु। द्यावापृथिवी इति। रोदसी इति। उभे इति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुजात) सुन्दर प्रसिद्धिमान् (देव) विद्या देनेवाले (अग्ने) बिजुली के समान सबसे अलग विद्वान् ! जो (त्वम्) आप (मज्मना) बल से वा पुरुषार्थ से (तान्) उन मनुष्यों को कि जो मोक्ष सुख और सांसारिक सुख साधनेवाले हैं। (प्रतिच) प्रतिनिधि और (सम् च) मिले हुए भी (असि) हैं। (च) और (प्ररिच्यसे) अलग होते हो और (उभे) दोनों (रोदसी) सांसारिक तुच्छ सुख के कारण रोने के निमित्त जो (द्यावापृथिवी) द्यावापृथिवी के समान (महिना) अपने महिमा से (यत्) जो (अत्र) यहाँ (पृक्षः) विद्या सम्बन्ध को भी प्राप्त हो जिन (ते) आपकी विद्या (अनु, वि, भुवत्) अनुकूल विशेषता से होती है। सो आप हमारे अध्यापक और उपदेशक हूजिये ॥१५॥
Essence
जैसे अग्नि में अनेक गुण हैं, वैसे विद्वानों की सेवा करने और धर्म में प्रवर्त्तमान होने वाले तथा अधर्म से निवृत्त जनों में इस संसार में बहुत शुभ गुण उत्पन्न होते हैं ॥१५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।