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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 14

43 Sukta
16 Mantra
2/1/14
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वे अ॑ग्ने॒ विश्वे॑ अ॒मृता॑सो अ॒द्रुह॑ आ॒सा दे॒वा ह॒विर॑द॒न्त्याहु॑तम्। त्वया॒ मर्ता॑सः स्वदन्त आसु॒तिं त्वं गर्भो॑ वी॒रुधां॑ जज्ञिषे॒ शुचिः॑॥

त्वे इति॑ । अ॒ग्ने॒ । विश्वे॑ । अ॒मृता॑सः । अ॒द्रुहः॑ । आ॒सा । दे॒वाः । ह॒विः । अ॒द॒न्ति॒ । आऽहु॑तम् । त्वया॑ । मर्ता॑सः । स्व॒द॒न्ते॒ । आ॒ऽसु॒तिम् । त्वम् । गर्भः॑ । वी॒रुधा॑म् । ज॒ज्ञि॒षे॒ । शुचिः॑ ॥

Mantra without Swara
त्वे अग्ने विश्वे अमृतासो अद्रुह आसा देवा हविरदन्त्याहुतम्। त्वया मर्तासः स्वदन्त आसुतिं त्वं गर्भो वीरुधां जज्ञिषे शुचिः॥

त्वे इति। अग्ने। विश्वे। अमृतासः। अद्रुहः। आसा। देवाः। हविः। अदन्ति। आऽहुतम्। त्वया। मर्तासः। स्वदन्ते। आऽसुतिम्। त्वम्। गर्भः। वीरुधाम्। जज्ञिषे। शुचिः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 4

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशमान ! आप (त्वे) तुम्हारे होते (अद्रुहः) द्रोह छोड़े हुए (विश्वे) सब (अमृतासः) अपने-अपने रूप से जन्म-मरण रहित जीवात्मा जिनके वे (देवाः) विद्वान् जन (आहुतम्) प्राप्त होने योग्य पदार्थ को (आसा) मुख से (हविः) जो कि विद्वानों के खाने योग्य है (अदन्ति) खाते हैं तथा जिन (त्वया) आपकी प्रेरणा से (स्वदन्ते) सुन्दरता से भोजन करते हुए (मर्त्तासः) शरीर के योग से जन्म-मरण सहित मनुष्य (आसुतिम्) जन्मयोग अर्थात् विद्या जन्म का संयोग सेवते हैं। जो (त्वम्) आप (वीरुधाम्) लता वृक्षादिकों के बीच (गर्भः) गर्भरूप अग्नि जैसे वैसे हो कर (शुचिः) पवित्र होते हुए (जज्ञिषे) प्रसिद्ध होते हैं। उन आपका विद्या की प्राप्ति के लिये लोग आश्रय करते हैं ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब जीव विद्यमान अग्नि के होते जीने और भोजन करने को योग्य होते हैं, वैसे शास्त्रज्ञ धर्मात्मा पढ़ानेवालों के होते पवित्र राग-द्वेष रहित सांसारिक और पारमार्थिक सुख को प्राप्त हुए मुक्ति के बीच आनन्द करते हुए जन्मान्तर संस्कार में पवित्र होते हैं ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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