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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 13

43 Sukta
16 Mantra
2/1/13
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्न आदि॒त्यास॑ आ॒स्यं१॒॑त्वां जि॒ह्वां शुच॑यश्चक्रिरे कवे। त्वां रा॑ति॒षाचो॑ अध्व॒रेषु॑ सश्चिरे॒ त्वे दे॒वा ह॒विर॑द॒न्त्याहु॑तम्॥

त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । आदि॒त्यासः॑ । आ॒स्य॑म् । त्वाम् । जि॒ह्वाम् । शुच॑यः । च॒क्रि॒रे॒ । क॒वे॒ । त्वाम् । रा॒ति॒ऽसाचः॑ । अ॒ध्व॒रेषु॑ । स॒श्चि॒रे॒ । त्वे इति॑ । दे॒वाः । ह॒विः । अ॒द॒न्ति॒ । आऽहु॑तम् ॥

Mantra without Swara
त्वामग्न आदित्यास आस्यं१त्वां जिह्वां शुचयश्चक्रिरे कवे। त्वां रातिषाचो अध्वरेषु सश्चिरे त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्॥

त्वाम्। अग्ने। आदित्यासः। आस्यम्। त्वाम्। जिह्वाम्। शुचयः। चक्रिरे। कवे। त्वाम्। रातिऽसाचः। अध्वरेषु। सश्चिरे। त्वे इति। देवाः। हविः। अदन्ति। आऽहुतम्॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 3

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Meaning
हे (कवे) समस्त साङ्गोपाङ्ग वेद के जाननेवाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वन् ! (आदित्यासः) बारह महीना जैसे सूर्य्य को वैसे विद्यार्थी जन जिन (त्वाम्) आपको (आस्यम्) मुख के समान अग्रगन्ता और (शुचयः) पवित्र शुद्धात्मा जन (त्वाम्) आपको (जिह्वाम्) वाणीरूप (चक्रिरे) कर रहे मान रहे हैं। तथा (अध्वरेषु) न नष्ट करने योग्य व्यवहारों में (रातिषाचः) दान के सेवनेवाले जन (त्वाम्) आपको (सश्चिरे) सम्यक् प्रकार से मिलते हैं। (त्वे) तुम्हारे होते (देवाः) विद्वान् जन ! (आहुतम्) सब ओर से ग्रहण किये हुए (हविः) भक्षण करने योग्य पदार्थ को (अदन्ति) खाते हैं। सो आप हमारे अध्यापक हूजिये ॥१३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे संवत्सर का आश्रय लेकर महीने मुख का आश्रय लेकर शरीर की पुष्टि जिह्वा के आश्रय से रस का विज्ञान यज्ञ को प्राप्त हो विद्वानों के सत्कार और उत्तम अन्न को पाकर रुचि होती है, वैसे आप्तशास्त्रज्ञ धर्मात्मा विद्वानों को प्राप्त होकर मनुष्य शुभगुणलक्षणयुक्त होते हैं ॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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