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Rigveda Mandal 2 / Sukta 1 / Mantra 11

43 Sukta
16 Mantra
2/1/11
Devata- अग्निः Rishi- आङ्गिरसः शौनहोत्रो भार्गवो गृत्समदः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने॒ अदि॑तिर्देव दा॒शुषे॒ त्वं होत्रा॒ भार॑ती वर्धसे गि॒रा। त्वमिळा॑ श॒तहि॑मासि॒ दक्ष॑से॒ त्वं वृ॑त्र॒हा व॑सुपते॒ सर॑स्वती॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । अदि॑तिः । दे॒व॒ । दा॒शुषे॑ । त्वम् । होत्रा॑ । भार॑ती । व॒र्ध॒से॒ । गि॒रा । त्वम् । इळा॑ । श॒तऽहि॑मा । अ॒सि॒ । दक्ष॑से । त्वम् । वृ॒त्र॒ऽहा । व॒सु॒ऽप॒ते॒ । सर॑स्वती ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने अदितिर्देव दाशुषे त्वं होत्रा भारती वर्धसे गिरा। त्वमिळा शतहिमासि दक्षसे त्वं वृत्रहा वसुपते सरस्वती॥

त्वम्। अग्ने। अदितिः। देव। दाशुषे। त्वम्। होत्रा। भारती। वर्धसे। गिरा। त्वम्। इळा। शतऽहिमा। असि। दक्षसे। त्वम्। वृत्रऽहा। वसुऽपते। सरस्वती॥

Ashtak » 2 Adhyay » 5 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देव) प्रकाशमान् ! (अग्ने) विद्या देनेवाले विद्वान् ! (त्वम्) आप (दाशुषे) दानशील शिष्य के लिये (अदितिः) अन्तरिक्ष प्रकाश के समान विद्या गुणों का प्रकाश करनेवाले हैं। (त्वम्) आप (होत्रा) ग्रहण करने योग्य (भारती) विद्या धारण करनेवाली बालिका के समान होते हुए (गिरा) सुन्दर शिक्षा और विद्यायुक्त वाणी से (वर्द्धसे) वृद्धि को प्राप्त होते हैं। (त्वम्) आप (दक्षसे) विद्या बल के देने के लिये (शतहिमा) सौ वर्ष जिसकी आयु वह (इळा) स्तुति के योग्य अध्यापिका के समान (असि) हैं। हे (वसुपते) धन के पालनेहारे (त्वम्) आप (वृत्रहा) मेघहन्ता सूर्य के समान तथा (सरस्वती) प्रज्ञान विज्ञानयुक्त वाणी के समान हैं ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। अच्छी विद्या का पढ़ाने हारा शास्त्र का पारगन्ता विद्वान् जन माता के समान पालना करता है और सब विषयों से उत्तमगुणों को देता है। उससे शिष्यजन शीघ्र विद्याबलयुक्त होते हैं ॥११॥
Subject
फिर अध्यापकविषय को अगले मन्त्र में कहा है।