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Rigveda Mandal 1 / Sukta 98 / Mantra 3

191 Sukta
3 Mantra
1/98/3
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वैश्वा॑नर॒ तव॒ तत्स॒त्यम॑स्त्व॒स्मान्रायो॑ म॒घवा॑नः सचन्ताम्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥

वैश्वा॑नर । तव॑ । तत् । स॒त्यम् । अ॒स्तु॒ । अ॒स्मान् । रायः॑ । म॒घवा॑नः । स॒च॒न्ता॒म् । तत् । नः॒ । मि॒त्रः । वरु॑णः । म॒म॒ह॒न्ता॒म् । अदि॑तिः । सिन्धुः॑ । पृ॒थि॒वी । उ॒त । द्यौः ॥

Mantra without Swara
वैश्वानर तव तत्सत्यमस्त्वस्मान्रायो मघवानः सचन्ताम्। तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौः ॥

वैश्वानर। तव। तत्। सत्यम्। अस्तु। अस्मान्। रायः। मघवानः। सचन्ताम्। तत्। नः। मित्रः। वरुणः। ममहन्ताम्। अदितिः। सिन्धुः। पृथिवी। उत। द्यौः ॥ १.९८.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वैश्वानर) सब मनुष्यों में विद्या का प्रकाश करनेहारे ईश्वर वा विद्वान् ! जो (तव) आपका (सत्यम्) सत्यशील है (तत्) वह (अस्मान्) हम लोगों को प्राप्त (अस्तु) हो, जो (मित्रः) मित्र (वरुणः) उत्तम गुणयुक्त स्वभाववाला मनुष्य (अदितिः) समस्त विद्वान् जन (सिन्धुः) अन्तरिक्ष में ठहरनेवाला जल (पृथिवी) भूमि और (द्यौः) बिजुली का प्रकाश (मामहन्ताम्) उन्नति देवे (तत्) वह ऐश्वर्य्य (नः) हम लोगों को प्राप्त हो, वा (मघवानः) जिनके परम सत्कार करने योग्य विद्या धन हैं वे विद्वान् व राजा लोग जिन (रायः) विद्या और राज्य श्री को (सचन्ताम्) निःसन्देह युक्त करें, उनको हम लोग (उत) और भी प्राप्त हों ॥ ३ ॥
Essence
ईश्वर और विद्वानों की उत्तेजना से सत्यशील धर्मयुक्त धन धार्मिक मनुष्य और क्रिया कौशलयुक्त पदार्थविद्याओं को पुरुषार्थ से पाकर समस्त सुख के लिये अच्छे प्रकार यत्न करें ॥ ३ ॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों से सम्बन्ध रखनेवाले कर्म के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह ९८ अठ्ठानवाँ सूक्त और ६ छठा वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
अब ईश्वर और विद्वान् कैसे हों, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।