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Rigveda Mandal 1 / Sukta 98 / Mantra 1

191 Sukta
3 Mantra
1/98/1
Devata- अग्निर्वैश्वानरः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ सुम॒तौ स्या॑म॒ राजा॒ हि कं॒ भुव॑नानामभि॒श्रीः। इ॒तो जा॒तो विश्व॑मि॒दं वि च॑ष्टे वैश्वान॒रो य॑तते॒ सूर्ये॑ण ॥

वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ । सु॒ऽम॒तौ । स्या॒म॒ । राजा॑ । हि । क॒म् । भुव॑नानाम् । अ॒भि॒ऽश्रीः । इ॒तः । जा॒तः । विश्व॑म् । इ॒दम् । वि । च॒ष्टे॒ । वै॒श्वा॒न॒रः । य॒त॒ते॒ । सूर्ये॑ण ॥

Mantra without Swara
वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः। इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण ॥

वैश्वानरस्य। सुऽमतौ। स्याम। राजा। हि। कम्। भुवनानाम्। अभिऽश्रीः। इतः। जातः। विश्वम्। इदम्। वि। चष्टे। वैश्वानरः। यतते। सूर्येण ॥ १.९८.१

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 6 Mantra » 1

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Meaning
जो (वैश्वानरः) समस्त जीवों को यथायोग्य व्यवहारों में वर्त्तानेवाला ईश्वर वा जाठराग्नि (इतः) कारण से (जातः) प्रसिद्ध हुए (इदम्) इस प्रत्यक्ष (कम्) सुख को (विश्वम्) वा समस्त जगत् को (विचष्टे) विशेष भाव से दिखलाता है और जो (सूर्येण) प्राण वा सूर्यलोक के साथ (यतते) यत्न करनेवाला होता है वा जो (भुवनानाम्) लोकों का (अभिश्रीः) सब प्रकार से धन है तथा जिस भौतिक अग्नि से सब प्रकार का धन होता है वा (राजा) जो न्यायाधीश सबका अधिपति है तथा प्रकाशमान बिजुलीरूप अग्नि है, उस (वैश्वानरस्य) समस्त पदार्थ को देनेवाले ईश्वर का भौतिक अग्नि की (सुमतौ) श्रेष्ठ मति में अर्थात् जो कि अत्यन्त उत्तम अनुपम ईश्वर की प्रसिद्ध की हुई मति वा भौतिक अग्नि से अतीव प्रसिद्ध हुई मति उसमें (हि) ही (वयम्) हम लोग (स्याम) स्थिर हों ॥ १ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो सबसे बड़ा व्याप्त होकर सब जगत् को प्रकाशित करता है, उसी के अति उत्तम गुणों से प्रसिद्ध उसकी आज्ञा में नित्य प्रवृत्त होओ तथा जो सूर्य्य आदि को प्रकाश करनेवाला अग्नि है, उसकी विद्या की सिद्धि में भी प्रवृत्त होओ, इसके विना किसी मनुष्य को पूर्ण धन नहीं हो सकते ॥ १ ॥
Subject
अब अट्ठानवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर और भौतिक अग्नि कैसे हैं, यह विषय कहा है ।

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