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Rigveda Mandal 1 / Sukta 97 / Mantra 8

191 Sukta
8 Mantra
1/97/8
Devata- अग्निः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स न॒: सिन्धु॑मिव ना॒वयाति॑ पर्षा स्व॒स्तये॑। अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥

सः । नः॒ । सिन्धु॑म्ऽइव । ना॒वया॑ । अति॑ । प॒र्ष॒ । स्व॒स्तये॑ । अप॑ । नः॒ । शोशु॑चत् । अ॒घम् ॥

Mantra without Swara
स न: सिन्धुमिव नावयाति पर्षा स्वस्तये। अप न: शोशुचदघम् ॥

सः। नः। सिन्धुम्ऽइव। नावया। अति। पर्ष। स्वस्तये। अप। नः। शोशुचत्। अघम् ॥ १.९७.८

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 8

Bhashya

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Meaning
हे जगदीश्वर ! (सः) सो आप कृपा करके (नः) हम लोगों के (स्वस्तये) सुख के लिये (नावया) नाव से (सिन्धुमिव) जैसे समुद्र को पार होते हैं, वैसे दुःखों के (अति, पर्ष) अत्यन्त पार कीजिये (नः) हम लोगों के (अघम्) अशान्ति और आलस्य को (आप, शोशुचत्) निरन्तर दूर कीजिये ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पार करनेवाला मल्लाह सुखपूर्वक मनुष्य आदि को नाव से समुद्र के पार करता है, वैसे तारनेवाला परमेश्वर विशेष ज्ञान से दुःखसागर से पार करता और वह शीघ्र सुखी करता है ॥ ८ ॥इस सूक्त में सभाध्यक्ष अग्नि और ईश्वर के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह सत्तानेवाँ सूक्त और पाचवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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