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Rigveda Mandal 1 / Sukta 97 / Mantra 7

191 Sukta
8 Mantra
1/97/7
Devata- अग्निः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
द्विषो॑ नो विश्वतोमु॒खाति॑ ना॒वेव॑ पारय। अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥

द्विषः॑ । नः॒ । वि॒श्व॒तः॒ऽमु॒ख॒ । अति॑ । ना॒वाऽइ॑व । पा॒र॒य॒ । अप॑ । नः॒ । शोशु॑चत् । अ॒घम् ॥

Mantra without Swara
द्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेव पारय। अप न: शोशुचदघम् ॥

द्विषः। नः। विश्वतःऽमुख। अति। नावाऽइव। पारय। अप। नः। शोशुचत्। अघम् ॥ १.९७.७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विश्वतोमुख) सबसे उत्तम ऐश्वर्य्य से युक्त परमात्मन् ! आप (नावेव) जैसे नाव से समुद्र के पार हों वैसे (नः) हम लोगों को (द्विषः) जो धर्म से द्वेष करनेवाले अर्थात् उससे विरुद्ध चलनेवाले उनसे (अति, पारय) पार पहुँचाइये और (नः) हम लोगों के (अघम्) शत्रुओं से उत्पन्न हुए दुःख को (अप, शोशुचत्) दूर कीजिये ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे न्यायाधीश नाव में बैठाकर समुद्र के पार वा निर्जन जङ्गल में डाकुओं को रोक के प्रजा की पालना करता है, वैसे ही अच्छे प्रकार उपासना को प्राप्त हुआ ईश्वर अपनी उपासना करनेवालों के काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोकरूपी शत्रुओं को शीघ्र निवृत्त कर जितेन्द्रियपन आदि गुणों को देता है ॥ ७ ॥
Subject
फिर भी वह परमेश्वर कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।