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Rigveda Mandal 1 / Sukta 97 / Mantra 5

191 Sukta
8 Mantra
1/97/5
Devata- अग्निः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र यद॒ग्नेः सह॑स्वतो वि॒श्वतो॒ यन्ति॑ भा॒नव॑:। अप॑ न॒: शोशु॑चद॒घम् ॥

प्र । यत् । अ॒ग्नेः । सह॑स्वतः । वि॒श्वतः । यन्ति॑ । भा॒नवः॑ । अप॑ । नः॒ । शोशु॑चत् । अ॒घम् ॥

Mantra without Swara
प्र यदग्नेः सहस्वतो विश्वतो यन्ति भानव:। अप न: शोशुचदघम् ॥

प्र। यत्। अग्नेः। सहस्वतः। विश्वतः। यन्ति। भानवः। अप। नः। शोशुचत्। अघम् ॥ १.९७.५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 5 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे विद्वानो ! तुम (यत्) जिस (सहस्वतः) प्रशंसित बलवाले (अग्नेः) भौतिक अग्नि की (भानवः) उजेला करती हुई किरण (विश्वतः) सब जगह से (प्रयन्ति) फैलती हैं वा जो (नः) हम लोगों के (अघम्) दरिद्रपन को (अप, शोशुचत्) दूर करता है, उसको कामों में अच्छे प्रकार जोड़ो ॥ ५ ॥
Essence
ऐसा कोई मूर्त्तिमान् पदार्थ नहीं कि जो इस बिजुली से अलग हो अर्थात् सब में बिजुली व्याप्त है और जो भौतिक अग्नि शिल्पविद्या से कामों में लगाया हुआ धन इकट्ठा करनेवाला होता है, वह मनुष्यों को अच्छे प्रकार जानना चाहिये ॥ ५ ॥
Subject
अब भौतिक अग्नि कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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