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Rigveda Mandal 1 / Sukta 96 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/96/4
Devata- द्रविणोदा अग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स मा॑त॒रिश्वा॑ पुरु॒वार॑पुष्टिर्वि॒दद्गा॒तुं तन॑याय स्व॒र्वित्। वि॒शां गो॒पा ज॑नि॒ता रोद॑स्योर्दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम् ॥

सः । मा॒त॒रिश्वा॑ । पु॒रु॒वार॑ऽपुष्टिः । वि॒दत् । गा॒तुम् । तन॑याय । स्वः॒ऽवित् । वि॒शाम् । गो॒पाः । ज॒नि॒ता । रोद॑स्योः । दे॒वाः । अ॒ग्निम् । धा॒र॒य॒न् । द्र॒वि॒णः॒ऽदाम् ॥

Mantra without Swara
स मातरिश्वा पुरुवारपुष्टिर्विदद्गातुं तनयाय स्वर्वित्। विशां गोपा जनिता रोदस्योर्देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम् ॥

सः। मातरिश्वा। पुरुवारऽपुष्टिः। विदत्। गातुम्। तनयाय। स्वःऽवित्। विशाम्। गोपाः। जनिता। रोदस्योः। देवाः। अग्निम्। धारयन्। द्रविणःऽदाम् ॥ १.९६.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 3 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को चाहिये कि जिस ईश्वर ने (तनयाय) अपने पुत्र के समान जीव के लिये (स्वर्वित्) सुख को पहुँचानेहारी (गातुम्) वाणी को (विदत्) प्राप्त कराया, (पुरुवारपुष्टिः) जिससे अत्यन्त समस्त व्यवहार के स्वीकार करने की पुष्टि होती है, वह (मातरिश्वा) अन्तरिक्ष में सोने और बाहर-भीतर रहनेवाला पवन बनाया है, जो (विशाम्) प्रजाजनों का (गोपाः) पालने और (रोदस्योः) उजेले-अन्धेरे को वर्त्तानेहारे लोकसमूहों का (जनिता) उत्पन्न करनेवाला है, जिस (द्रविणोदाम्) धन देनेवाले के तुल्य (अग्निम्) जगदीश्वर को (देवाः) उक्त विद्वान् जन (धारयन्) धारण करते वा कराते हैं (सः) वह सब दिन इष्टदेव मानने योग्य है ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पवन के निमित्त के विना किसी की वाणी प्रवृत्त नहीं हो सकती, न किसी की पुष्टि होने के योग्य और न ईश्वर के विना इस जगत् की उत्पत्ति और रक्षा के होने की संभावना है ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।