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Rigveda Mandal 1 / Sukta 96 / Mantra 2

191 Sukta
9 Mantra
1/96/2
Devata- द्रविणोदा अग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स पूर्व॑या नि॒विदा॑ क॒व्यता॒योरि॒माः प्र॒जा अ॑जनय॒न्मनू॑नाम्। वि॒वस्व॑ता॒ चक्ष॑सा॒ द्याम॒पश्च॑ दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम् ॥

सः । पूर्व॑या । नि॒ऽविदा॑ । क॒व्यता॑ । आ॒योः । इ॒माः । प्र॒ऽजाः । अ॒ज॒न॒य॒त् । मनू॑नाम् । वि॒वस्व॑ता । चक्ष॑सा । द्याम् । अ॒पः । च॒ । दे॒वाः । अ॒ग्निम् । धा॒र॒य॒न् । द्र॒वि॒णः॒ऽदाम् ॥

Mantra without Swara
स पूर्वया निविदा कव्यतायोरिमाः प्रजा अजनयन्मनूनाम्। विवस्वता चक्षसा द्यामपश्च देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम् ॥

सः। पूर्वया। निऽविदा। कव्यता। आयोः। इमाः। प्रऽजाः। अजनयत्। मनूनाम्। विवस्वता। चक्षसा। द्याम्। अपः। च। देवाः। अग्निम्। धारयन्। द्रविणःऽदाम् ॥ १.९६.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 3 Mantra » 2

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Meaning
मनुष्यों को जो (पूर्वया) प्राचीन (निविदा) वेदवाणी (कव्यता) जिससे कि कविताई आदि कामों का विस्तार करें, उससे (मनूनाम्) विचारशील पुरुषों के समीप (आयोः) सनातन कारण से (इमाः) इन प्रत्यक्ष (प्रजाः) उत्पन्न होनेवाले प्रजाजनों को (अजनयन्) उत्पन्न करता है वा (विवस्वता) (चक्षसा) सब पदार्थों को दिखानेवाले सूर्य्य से (द्याम्) प्रकाश (आपः) जल (च) पृथिवी वा ओषधि आदि पदार्थों तथा जिस (द्रविणोदाम्) धन देनेवाले (अग्निम्) परमेश्वर को (देवाः) आप्त विद्वान् जन (धारयन्) धारण करते हैं (सः) वह नित्य उपासना करने योग्य है ॥ २ ॥
Essence
ज्ञानवान् अर्थात् जो चेतनायुक्त है, उसके विना उत्पन्न किये कुछ जड़ पदार्थ कार्य्य करनेवाला आप नहीं उत्पन्न हो सकता, इससे समस्त जगत् के उत्पन्न करनेहारे सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर को सब मनुष्य मानें अर्थात् तृणमात्र जो आप से नहीं उत्पन्न हो सकता तो यह कार्य्य जगत् कैसे उत्पन्न हो सके, इससे इसको उत्पन्न करनेवाला जो चेतनरूप है, वही परमेश्वर है ॥ २ ॥
Subject
फिर वह परमेश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

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