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Rigveda Mandal 1 / Sukta 95 / Mantra 8

191 Sukta
11 Mantra
1/95/8
Devata- सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वे॒षं रू॒पं कृ॑णुत॒ उत्त॑रं॒ यत्स॑म्पृञ्चा॒नः सद॑ने॒ गोभि॑र॒द्भिः। क॒विर्बु॒ध्नं परि॑ मर्मृज्यते॒ धीः सा दे॒वता॑ता॒ समि॑तिर्बभूव ॥

त्वे॒षम् । रू॒पम् । कृ॒णुते॒ । उत्ऽत॑रम् । यत् । स॒म्ऽपृ॒ञ्चा॒नः । सद॑ने॒ । गोऽभिः॑ । अ॒त्ऽभिः । क॒विः । बु॒ध्नम् । परि॑ । म॒र्मृ॒ज्य॒ते॒ । धीः । सा । दे॒वता॑ता । सम्ऽइ॑तिः । ब॒भू॒व॒ ॥

Mantra without Swara
त्वेषं रूपं कृणुत उत्तरं यत्सम्पृञ्चानः सदने गोभिरद्भिः। कविर्बुध्नं परि मर्मृज्यते धीः सा देवताता समितिर्बभूव ॥

त्वेषम्। रूपम्। कृणुते। उत्ऽतरम्। यत्। सम्ऽपृञ्चानः। सदने। गोऽभिः। अत्ऽभिः। कविः। बुध्नम्। परि। मर्मृज्यते। धीः। सा। देवताता। सम्ऽइतिः। बभूव ॥ १.९५.८

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को चाहिये (यत्) जो (संपृञ्चानः) अच्छा परिचय करता-कराता हुआ (कविः) जिसका क्रम से दर्शन होता है यह समय (सदने) भुवन में (गोभिः) सूर्य्य की किरणों वा (अद्भिः) प्राण आदि पवनों से (उत्तरम्) उत्पन्न होनेवाले (त्वेषम्) मनोहर (बुध्नम्) प्राण और बल सम्बन्धी विज्ञान और (रूपम्) स्वरूप को (कृणुते) करता है तथा जो (धीः) उत्तम बुद्धि वा क्रिया (परि) (मर्मृज्यते) सबप्रकार से शुद्ध होती है (सा) वह (देवताता) ईश्वर और विद्वानों के साथ (समितिः) विशेष ज्ञान की मर्यादा (बभूव) होती है, इस समस्त उक्त व्यवहार को जानकर बुद्धि को उत्पन्न करें ॥ ८ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि काल के विना कार्य्य स्वरूप उत्पन्न होकर और नष्ट हो जाय यह होता ही नहीं और न ब्रह्मचर्य्य आदि उत्तम समय के सेवन विना शास्त्रबोध करानेवाली बुद्धि होती है। इस कारण काल के परमसूक्ष्म स्वरूप को जानकर थोड़ा भी समय व्यर्थ न खोवें किन्तु आलस्य छोड़ के समय के अनुकूल व्यवहार और परमार्थ काम का सदा अनुष्ठान करें ॥ ८ ॥
Subject
फिर वह काल क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।