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Rigveda Mandal 1 / Sukta 95 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/95/7
Devata- सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उद्यं॑यमीति सवि॒तेव॑ बा॒हू उ॒भे सिचौ॑ यतते भी॒म ऋ॒ञ्जन्। उच्छु॒क्रमत्क॑मजते सि॒मस्मा॒न्नवा॑ मा॒तृभ्यो॒ वस॑ना जहाति ॥

उत् । यं॒य॒मी॒ति॒ । स॒वि॒ताऽइ॑व । बा॒हू इति॑ । उ॒भे इति॑ । सिचौ॑ । य॒त॒ते॒ । भी॒मः । ऋ॒ञ्जन् । उत् । शु॒क्रम् । अत्क॑म् । अ॒ज॒ते॒ । सि॒मस्मा॑त् । नवा॑ । मा॒तृऽभ्यः॒ । वस॑ना । ज॒हा॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
उद्यंयमीति सवितेव बाहू उभे सिचौ यतते भीम ऋञ्जन्। उच्छुक्रमत्कमजते सिमस्मान्नवा मातृभ्यो वसना जहाति ॥

उत्। यंयमीति। सविताऽइव। बाहू इति। उभे इति। सिचौ। यतते। भीमः। ऋञ्जन्। उत्। शुक्रम्। अत्कम्। अजते। सिमस्मात्। नवा। मातृऽभ्यः। वसना। जहाति ॥ १.९५.७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (भीमः) भयङ्कर (ऋञ्जन्) सबको प्राप्त होता हुआ काल (मातृभ्यः) मान करनेहारे क्षण आदि अपने अवयवों से (सवितेव) जैसे सूर्य्यलोक अपनी आकर्षणशक्ति से भूगोल आदि लोकों का धारण करता है वैसे (उद्यंयमीति) बार-बार नियम रखता है (बाहू) बल और पराक्रम वा (उभे) सूर्य्य और पृथिवी (सिचौ) वा वर्ष के द्वारा सींचनेवाले पवन और अग्नि को (यतते) व्यवहार में लाता है, वह काल (अत्कम्) निरन्तर (शुक्रम्) पराक्रम को (सिमस्मात्) सब जगत् से (उद्) ऊपर की श्रेणी को (अजते) पहुँचाता और (नवा) नवीन (वसना) आच्छादनों को (जहाति) छोड़ता है, यह जानो ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम लोगों को जिस काल से सूर्य आदि जगत् प्रकट होता है और जो क्षण आदि अङ्गों से सबका आच्छादन करता, सबके नियम का हेतु वा सबकी प्रवृत्ति का अधिकरण है, उसको जान के समय-समय पर काम करने चाहिये ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह समय कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।