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Rigveda Mandal 1 / Sukta 95 / Mantra 5

191 Sukta
11 Mantra
1/95/5
Devata- सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒विष्ट्यो॑ वर्धते॒ चारु॑रासु जि॒ह्माना॑मू॒र्ध्वः स्वय॑शा उ॒पस्थे॑। उ॒भे त्वष्टु॑र्बिभ्यतु॒र्जाय॑मानात्प्रती॒ची सिं॒हं प्रति॑ जोषयेते ॥

आ॒विःऽत्यः॑ । व॒र्ध॒ते॒ । चारुः॑ । आ॒सु॒ । जि॒ह्माना॑म् । ऊ॒र्ध्वः । स्वऽय॑शाः । उ॒पऽस्थे॑ । उ॒भे इति॑ । त्वष्टुः॑ । बि॒भ्य॒तुः॒ । जाय॑मानात् । प्र॒ती॒ची इति॑ । सिं॒हम् । प्रति॑ । जो॒ष॒ये॒ते॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
आविष्ट्यो वर्धते चारुरासु जिह्मानामूर्ध्वः स्वयशा उपस्थे। उभे त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते ॥

आविःऽत्यः। वर्धते। चारुः। आसु। जिह्मानाम्। ऊर्ध्वः। स्वऽयशाः। उपऽस्थे। उभे इति। त्वष्टुः। बिभ्यतुः। जायमानात्। प्रतीची इति। सिंहम्। प्रति। जोषयेते इति ॥ १.९५.५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम जिस (जायमानात्) प्रसिद्ध (त्वष्टुः) छेदन करने अर्थात् सबकी अवधि को पूरी करनेहारे समय से (उभे) दोनों रात्रि और दिन (बिभ्यतुः) सबको डरपाते हैं वा जिससे (प्रतीची) पछांह की दिशा प्रकट होती है वा उक्त रात्रि-दिन सब व्यवहारों का (प्रति, जोषयेते) सेवन तथा जो समय (उपस्थे) काम करनेवालों के समीप (स्वयशाः) अपनी कीर्त्ति अर्थात् प्रशंसा को प्राप्त होता वा (जिह्मानाम्) कुटिलों से (ऊर्ध्वः) ऊपर-ऊपर अर्थात् उनके शुभकर्म में नहीं व्यतीत होता (आसु) इन दिशा वा प्रजाजनों में (चारुः) सुन्दर (आविष्ट्यः) प्रकट हुए व्यवहारों में प्रसिद्ध (वर्धते) और उन्नति को पाता है, उस (सिंहम्) हम तुम सबको काटनेहारे समय को तुम लोग यथावत् जानो ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि संसार की उत्पत्ति के समय से जो उत्पन्न हुआ अग्नि है वह छेदन गुण से ऊर्ध्वगामी अर्थात् जिसकी लपट ऊपर को जाती और काष्ठ आदि पदार्थों में अपनी व्याप्ति से बढ़ता और सूर्यरूप से दिशाओं का बोध करानेवाला है, वह भी सब समय से उत्पन्न होकर समय पाकर ही नष्ट होता है ॥ ५ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।