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Rigveda Mandal 1 / Sukta 95 / Mantra 3

191 Sukta
11 Mantra
1/95/3
Devata- सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रीणि॒ जाना॒ परि॑ भूषन्त्यस्य समु॒द्र एकं॑ दि॒व्येक॑म॒प्सु। पूर्वा॒मनु॒ प्र दिशं॒ पार्थि॑वानामृ॒तून्प्र॒शास॒द्वि द॑धावनु॒ष्ठु ॥

त्रीणि॑ । जाना॑ । परि॑ । भू॒ष॒न्ति॒ । अ॒स्य॒ । स॒मु॒द्रे । एक॑म् । दि॒वि । एक॑म् । अ॒प्ऽसु । पूर्वा॑म् । अनु॑ । प्र । दिश॑म् । पार्थि॑वानाम् । ऋ॒तून् । प्र॒ऽशास॑त् । वि । द॒धौ॒ । अ॒नु॒ष्ठु ॥

Mantra without Swara
त्रीणि जाना परि भूषन्त्यस्य समुद्र एकं दिव्येकमप्सु। पूर्वामनु प्र दिशं पार्थिवानामृतून्प्रशासद्वि दधावनुष्ठु ॥

त्रीणि। जाना। परि। भूषन्ति। अस्य। समुद्रे। एकम्। दिवि। एकम्। अप्ऽसु। पूर्वाम्। अनु। प्र। दिशम्। पार्थिवानाम्। ऋतून्। प्रऽशासत्। वि। दधौ। अनुष्ठु ॥ १.९५.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे गणितविद्या को जाननेवाले मनुष्यो ! जो दिन-रात (पूर्वाम्) पूर्व (प्र, दिशम्) प्रदेश जिसका कि मनुष्य उपदेश किया करते हैं उसको (अनुष्ठु) तथा उसके अनुकूल (पार्थिवानाम्) पृथिवी और अन्तरिक्ष में विदित हुए पदार्थों के बीच (ऋतून्) वसन्त आदि ऋतुओं को (प्रशासत्) प्रेरणा देता हुआ (अनु) तदनन्तर उनका (वि, दधौ) विधान करता है (अस्य) इस दिन-रात का (एकम्) एक पाँव (दिवि) सूर्य्य में, एक (समुद्रे) समुद्र में और (एकम्) एक (अप्सु) प्राण आदि पवनों में है तथा इस दिन-रात के अङ्ग (त्रीणि) अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान के पृथग्भाव से उत्पन्न (जाना) मनुष्यों में हुए व्यवहारों को (परि, भूषन्ति) शोभित करते हैं, इन सबको जानो ॥ ३ ॥
Essence
दिन-रात आदि समय के अङ्गों के वर्त्ताव के विना भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान कालों की संभावना भी नहीं हो सकती और न इनके विना किसी ऋतु के होने का सम्भव है। जो सूर्य्य और अन्तरिक्ष में ठहरे हुए पवन की गति से समय के अवयव अर्थात् दिनरात्रि आदि प्रसिद्ध हैं, उन सबको जान के सब मनुष्यों को चाहिये कि व्यवहारसिद्धि करें ॥ ३ ॥
Subject
फिर वह दिन और रात क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।