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Rigveda Mandal 1 / Sukta 95 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/95/2
Devata- सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दशे॒मं त्वष्टु॑र्जनयन्त॒ गर्भ॒मत॑न्द्रासो युव॒तयो॒ विभृ॑त्रम्। ति॒ग्मानी॑कं॒ स्वय॑शसं॒ जने॑षु वि॒रोच॑मानं॒ परि॑ षीं नयन्ति ॥

दश॑ । इ॒मम् । त्वष्टुः॑ । ज॒न॒य॒न्त॒ । गर्भ॑म् । अत॑न्द्रासः । यु॒व॒तयः॑ । विऽभृ॑त्रम् । ति॒ग्मऽअ॑नी॑कम् । स्वऽय॑शसम् । जने॑षु । वि॒ऽरोच॑मानम् । परि॑ । सी॒म् । न॒य॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
दशेमं त्वष्टुर्जनयन्त गर्भमतन्द्रासो युवतयो विभृत्रम्। तिग्मानीकं स्वयशसं जनेषु विरोचमानं परि षीं नयन्ति ॥

दश। इमम्। त्वष्टुः। जनयन्त। गर्भम्। अतन्द्रासः। युवतयः। विऽभृत्रम्। तिग्मऽअनीकम्। स्वऽयशसम्। जनेषु। विऽरोचमानम्। परि। सीम्। नयन्ति ॥ १.९५.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 1 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (अतन्द्रासः) जो एक नियम के साथ रहने से निरालसता आदि गुणों से युक्त (युवतयः) जवान स्त्रियों के समान एक-दूसरे के साथ मिलने वा न मिलने से सब कभी अजर-अमर रहनेवाली (दश) दश दिशा (त्वष्टुः) बिजुली वा पवन के (इमम्) इस प्रत्यक्ष अहोरात्र से प्रसिद्ध (गर्भम्) समस्त व्यवहार का कारणरूप (विभृत्रम्) जो कि अनेकों प्रकार की क्रिया को धारण किये हुए (तिग्मानीकम्) जिसमें अत्यन्त तीक्ष्ण सेनाजन विद्यमान जो (जनेषु) गणितविद्या के जाननेवाले मनुष्यों में (विरोचमानम्) अनेक रीति से प्रकाशमान (स्वयशसम्) अनेक गुण, कर्म्म, स्वभाव और प्रशंसायुक्त (सीम्) प्राप्त होने के योग्य उस दिन-रात के व्यवहार को (जनयन्त) उत्पन्न करती और (परि) सब ओर से (नयन्ति) स्वीकार करती हैं, उनको तुम लोग जानो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिनके देश-काल का नियम अनुमान में नहीं आता, ऐसी अनन्तरूप पूर्व आदि क्रम से प्रसिद्ध सब व्यवहारों की सिद्धि करानेवाली दश दिशा हैं, उनमें नियमयुक्त व्यवहारों को सिद्ध करें, इनमें किसी को विरुद्ध व्यवहार न करना चाहिये ॥ २ ॥
Subject
अब दिन-रात का व्यवहार दिशाओं के मिष से अगले मन्त्र में कहा है ।