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Rigveda Mandal 1 / Sukta 95 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/95/10
Devata- सत्यगुणविशिष्टोऽग्निः शुद्धोऽग्निर्वा Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धन्व॒न्त्स्रोत॑: कृणुते गा॒तुमू॒र्मिं शु॒क्रैरू॒र्मिभि॑र॒भि न॑क्षति॒ क्षाम्। विश्वा॒ सना॑नि ज॒ठरे॑षु धत्ते॒ऽन्तर्नवा॑सु चरति प्र॒सूषु॑ ॥

धन्व॑न् । स्रोतः॑ । कृ॒णु॒ते॒ । ग॒तुम् । ऊ॒र्मिम् । शु॒क्रैः । ऊ॒र्मिऽभिः॑ । अ॒भि । न॒क्ष॒ति॒ । क्षाम् । विश्वा॑ । सना॑नि । ज॒ठरे॑षु । ध॒त्ते॒ । अ॒न्तः । नवा॑सु । च॒र॒ति॒ । प्र॒ऽसूषु॑ ॥

Mantra without Swara
धन्वन्त्स्रोत: कृणुते गातुमूर्मिं शुक्रैरूर्मिभिरभि नक्षति क्षाम्। विश्वा सनानि जठरेषु धत्तेऽन्तर्नवासु चरति प्रसूषु ॥

धन्वन्। स्रोतः। कृणुते। गातुम्। ऊर्मिम्। शुक्रैः। ऊर्मिऽभिः। अभि। नक्षति। क्षाम्। विश्वा। सनानि। जठरेषु। धत्ते। अन्तः। नवासु। चरति। प्रऽसूषु ॥ १.९५.१०

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 2 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो समय वा बिजुलीरूप आग (धन्वन्) अन्तरिक्ष में (स्रोतः) जिससे और-और वस्तु वा जल प्राप्त होते हैं उस (गातुम्) प्राप्त होने योग्य (ऊर्मिम्) प्रातःसमय की वेला वा जल की तरङ्ग को (कृणुते) प्रकट करता है वा (शुक्रैः) शुद्ध क्रम वा किरणों और (ऊर्मिभिः) पदार्थ प्राप्त कराने हारे तरङ्गों से (क्षाम्) भूमि को भी (अभि, नक्षति) सब ओर से व्याप्त और प्राप्त होता है वा जो (जठरेषु) भीतरले व्यवहारों और पेट के भीतर अन्न आदि पचाने के स्थानों में (विश्वा) समस्त (सनानि) न्यारे-न्यारे पदार्थों को (धत्ते) स्थापित करता वा जो (प्रसूषु) पदार्थ उत्पन्न होते हैं उनमें वा (नवासु) नवीन प्रजाजनों में (अन्तः) भीतर (चरति) विचरता है, उसको यथावत् जानो ॥ १० ॥
Essence
आप्त विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि व्यापनशील काल और बिजुलीरूप अग्नि को जानकर उनके निमित्त से अनेक कामों को यथावत् सिद्ध करें ॥ १० ॥
Subject
अब समय वा अग्नि किस प्रकार का है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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