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Rigveda Mandal 1 / Sukta 94 / Mantra 9

191 Sukta
16 Mantra
1/94/9
Devata- अग्निः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
व॒धैर्दु॒:शंसाँ॒ अप॑ दू॒ढ्यो॑ जहि दू॒रे वा॒ ये अन्ति॑ वा॒ के चि॑द॒त्रिण॑:। अथा॑ य॒ज्ञाय॑ गृण॒ते सु॒गं कृ॒ध्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

व॒धैः । दुः॒ऽशंसा॑न् । अप॑ । दुः॒ऽध्यः॑ । ज॒हि॒ । दू॒रे । वा॒ । ये । अन्ति॑ । वा॒ । के । चि॒त् । अ॒त्रिणः॑ । अथ॑ । य॒ज्ञाय॑ । गृ॒ण॒ते॒ । सु॒ऽगम् । कृ॒धि॒ । अग्ने॑ । स॒ख्ये । मा । रि॒षा॒म॒ । व॒यम् । तव॑ ॥

Mantra without Swara
वधैर्दु:शंसाँ अप दूढ्यो जहि दूरे वा ये अन्ति वा के चिदत्रिण:। अथा यज्ञाय गृणते सुगं कृध्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ॥

वधैः। दुःऽशंसान्। अप। दुःऽध्यः। जहि। दूरे। वा। ये। अन्ति। वा। के। चित्। अत्रिणः। अथ। यज्ञाय। गृणते। सुऽगम्। कृधि। अग्ने। सख्ये। मा। रिषाम। वयम्। तव ॥ १.९४.९

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 31 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभा, सेना और शाला आदि के अध्यक्ष विद्वान् ! आप जैसे (दूढ्यः) दुष्ट बुद्धियों और (दुःशंसान्) जिनकी दुःख देनेहारी सिखावटें हैं, उन डाकू आदि (अत्रिणः) शत्रुजनों को (वधैः) ताड़नाओं से (अप, जहि) अपघात अर्थात् दुर्गति से दुःख देओ और शरीर (वा) वा आत्मभाव से (दूरे) दूर (वा) अथवा (अन्ति) समीप में (ये) जो (केचित्) कोई अधर्मी शत्रु वर्त्तमान हों, उनको (अपि) भी अच्छी शिक्षा वा प्रबल ताड़नाओं से सीधा करो। ऐसे करके (अथ) पीछे (यज्ञाय) क्रियामय यज्ञ के लिये (गृणते) विद्या को प्रशंसा करते हुए पुरुष के योग्य (सुगम्) जिस काम में विद्या पहुँचती है, उसको (कृधि) कीजिये, इस कारण ऐसे समर्थ (तव) आपके (सख्ये) मित्रपन में (वयम्) हम लोग (मा, रिषाम) मत दुःख पावें ॥ ९ ॥
Essence
सभाध्यक्षादिकों को चाहिये कि उत्तम यत्न के साथ प्रजा में अयोग्य उपदेशों के पढ़ने-पढ़ाने आदि कामों को निवार के दूरस्थ मनुष्यों को मित्र के समान मान के सब प्रकार से प्रेमभाव उत्पन्न करें, जिससे परस्पर निश्चल आनन्द बढ़े ॥ ९ ॥
Subject
अब सभा, सेना और शाला आदि के अध्यक्षों के गुणों का उपदेश किया है ।