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Rigveda Mandal 1 / Sukta 94 / Mantra 4

191 Sukta
16 Mantra
1/94/4
Devata- अग्निः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
भरा॑मे॒ध्मं कृ॒णवा॑मा ह॒वींषि॑ ते चि॒तय॑न्त॒: पर्व॑णापर्वणा व॒यम्। जी॒वात॑वे प्रत॒रं सा॑धया॒ धियोऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

भरा॑म । इ॒ध्मम् । कृ॒णवा॑म । ह॒वींषि॑ । ते॒ । चि॒तय॑न्तः । पर्व॑णाऽपर्वणा । व॒यम् । जी॒वात॑वे । प्र॒ऽत॒रम् । सा॒ध॒य॒ । धियः॑ । अग्ने॑ । स॒ख्ये । मा । रि॒षा॒म॒ । व॒यम् । तव॑ ॥

Mantra without Swara
भरामेध्मं कृणवामा हवींषि ते चितयन्त: पर्वणापर्वणा वयम्। जीवातवे प्रतरं साधया धियोऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ॥

भराम। इध्मम्। कृणवाम। हवींषि। ते। चितयन्तः। पर्वणाऽपर्वणा। वयम्। जीवातवे। प्रऽतरम्। साधय। धियः। अग्ने। सख्ये। मा। रिषाम। वयम्। तव ॥ १.९४.४

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 30 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (पर्वणापर्वणा) पूरे-पूरे साधन से (चितयन्तः) गुणों को चुनते हुए (वयम्) हम लोग (ते) आपके लिये वा इस अग्नि के लिये (हवींषि) यज्ञ के योग्य जो पदार्थ हैं, उनको अच्छे प्रकार (कृणवाम) करें और (इध्मम्) ईंधन (भराम) लावें, आप (जीवातवे) हमारे जीवने के लिये (धियः) उत्तम बुद्धि वा कर्मों को (प्रतरम्) अति उत्तमता जैसे हो, वैसे (साधय) सिद्ध करो, ऐसे (तव) आपके वा इस भौतिक अग्नि के (सख्ये) मित्रपन में (वयम्) हम लोग (मा, रिषाम) मत दुःखी हों ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सेना, सभा और प्रजा के जनों में रहनेहारे पुरुषों को चाहिये कि जिस सज्जन पुरुष से बुद्धि वा पुरुषार्थ बढ़ें, उसके लिये सब सामग्री अच्छी सिद्ध करें और उस पुरुष के साथ मित्रता को कोई भी न छोड़े ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।