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Rigveda Mandal 1 / Sukta 94 / Mantra 15

191 Sukta
16 Mantra
1/94/15
Devata- अग्निः Rishi- कुत्सः आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यस्मै॒ त्वं सु॑द्रविणो॒ ददा॑शोऽनागा॒स्त्वम॑दिते स॒र्वता॑ता। यं भ॒द्रेण॒ शव॑सा चो॒दया॑सि प्र॒जाव॑ता॒ राध॑सा॒ ते स्या॑म ॥

यस्मै॑ । त्वम् । सु॒ऽद्र॒वि॒णः॒ । ददा॑शः । अ॒ना॒गाः॒ऽत्वम् । अ॒दि॒ते॒ । स॒र्वऽता॑ता । यम् । भ॒द्रेण॑ । शव॑सा । चो॒दया॑सि । प्र॒जाऽव॑ता । राध॑सा । ते॒ । स्या॒म॒ ॥

Mantra without Swara
यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशोऽनागास्त्वमदिते सर्वताता। यं भद्रेण शवसा चोदयासि प्रजावता राधसा ते स्याम ॥

यस्मै। त्वम्। सुऽद्रविणः। ददाशः। अनागाःऽत्वम्। अदिते। सर्वऽताता। यम्। भद्रेण। शवसा। चोदयासि। प्रजाऽवता। राधसा। ते। स्याम ॥ १.९४.१५

Ashtak » 1 Adhyay » 6 Varga » 32 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुद्रविणः) अच्छे-अच्छे धनों के देने और (अदिते) विनाश को न प्राप्त होनेवाले जगदीश्वर वा विद्वन् ! जिस कारण (त्वम्) आप (सर्वताता) समस्त व्यवहार में (यस्मै) जिस मनुष्य के लिये (अनागास्त्वम्) निरपराधता को (ददाशः) देते हैं तथा (यम्) जिस मनुष्य को (भद्रेण) सुख करनेवाले (शवसा) शारीरिक, आत्मिक बल और (प्रजावता) जिसमें प्रशंसित पुत्र आदि हैं उस (राधसा) विद्या, सुवर्ण आदि धन से युक्त करके अच्छे व्यवहार में (चोदयासि) लगाते हैं, इससे आपकी वा विद्वानों की शिक्षा में वर्त्तमान जो हम लोग अनेकों प्रकार से यत्न करें (ते) वे हम इस काल में स्थिर (स्याम) हों ॥ १५ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जिस मनुष्य में अन्तर्यामी ईश्वर धर्मशीलता को प्रकाशित करता है, वह मनुष्य विद्वानों के सङ्ग में प्रेमी हुआ सब प्रकार के धन और अच्छे-अच्छे गुणों को पाकर सब दिनों सुखी होता है, इससे इस काम को हम लोग भी नित्य करें ॥ १५ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।